इस माह की 8 तारीख को महिला दिवस मनाया जाता है
इसलिए इस माह का अद्यतन भी महिला विशेषांक
रूप में ही है.
गतमाह की भाँति इस माह के अद्यतन को भी केवल महिला रचनाकारों की
रचनाओं से ही सजाया गया है।
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस महिलाओं के राजनीतिक
एवं सामाजिक उत्थान के लिए मनाया जाता हैं। पुरुष और महिला के बीच की खाई को पाटने
का काम सदियों से हो रहा है उसके बावजूद आज भी महिलाएं अपने अस्तित्व, अपनी
अस्मिता की रक्षा के लिए जूझ रही हैं। “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र
देवता” नारी की महिमा का मंडन करता हुआ यह श्लोक-वाक्य आज विस्मृत कर दिया गया है।
इस सत्य को पुनः स्थापित करने की आवश्यकता है।
साथ ही इस अद्यतन में फागुन की खुशियाँ भी समाहित हैं। ‘नदी और नारी की समानता’ दिखाता हुआ आलेख, ‘दोराहा’ - मन की व्यथादर्शाती कविता, ‘कभी ऐसे भी सोचना’ - सोचने के लिए मजबूर करती कविता, ‘पर्दो अर गहना’ के रूप में मर्म स्पर्शी राजस्थानी लघुकथा, ‘अहंकार क्या है’ – विवेचना प्रस्तुत करती कविता, हिंदी भाषा की स्थिति पर चिंतनीय आलेख, आशाओं के दीप जलाते हुए जीत को लिखता गीत, फागुनी रंग उड़ाते माहिए, चौपाई, दोहे, सोरठे, कुण्डलिया के साथ साथ और भी अनेक रचनाओं के अबीर-गुलाल लिए रंगोत्सव मनाने के लिए हम आपके समक्ष उपस्थित हैं।
“कोस-कोस पर पानी बदले, चार कोस पर बानी।” जी हाँ, यह भारत की विशेषता है, इसी विशेषता को ध्यान में रखते हुए इस अंक में आपको संस्कृत और हिंदी के साथ-साथ गुजराती, मराठी, भोजपुरी, राजस्थानी, ब्रजभाषा, उर्दू और छत्तीसगढ़ी भाषा में भी रचनाएं पढ़ने को मिलेंगी। हमारा उद्देश्य साहित्य से सुसज्जित सभी विधाओं को आप तक पहुँचाना है। अच्छा साहित्य हमारे लिए अच्छे पोषण का काम करता है। हमारी चेतना हमारी मनःस्थिति को अनुकूल रूप में ढालता है। आज जहाँ मीडिया ने हमारी संस्कृति, हमारी सोच को मॉडर्न कहकर बिल्कुल बदल दिया हैं, वही एक प्रयास है कि एक अच्छा साहित्य परोसकर हम अपनी संस्कृति में आए बदलाव के प्रति जागरूकता उत्पन्न कर सके। हमारा उद्देश्य मात्रा नहीं अपितु गुणवत्ता प्रस्तुत करना है।
मैं आदरणीय नवीन चतुर्वेदी सर जी की आभारी हूँ जिन्होंने मुझे मेरे अन्दर एक नवीन शख्सियत को जानने का अवसर प्रदान किया।
आशा है कि आपको विविध रंगों को बिखेरता हुआ यह अद्यतन पसन्द आयेगा. आपकी बहुमूल्य राय की प्रतीक्षा रहेगी.
अर्चना वर्मा सिंह
साथ ही इस अद्यतन में फागुन की खुशियाँ भी समाहित हैं। ‘नदी और नारी की समानता’ दिखाता हुआ आलेख, ‘दोराहा’ - मन की व्यथादर्शाती कविता, ‘कभी ऐसे भी सोचना’ - सोचने के लिए मजबूर करती कविता, ‘पर्दो अर गहना’ के रूप में मर्म स्पर्शी राजस्थानी लघुकथा, ‘अहंकार क्या है’ – विवेचना प्रस्तुत करती कविता, हिंदी भाषा की स्थिति पर चिंतनीय आलेख, आशाओं के दीप जलाते हुए जीत को लिखता गीत, फागुनी रंग उड़ाते माहिए, चौपाई, दोहे, सोरठे, कुण्डलिया के साथ साथ और भी अनेक रचनाओं के अबीर-गुलाल लिए रंगोत्सव मनाने के लिए हम आपके समक्ष उपस्थित हैं।
“कोस-कोस पर पानी बदले, चार कोस पर बानी।” जी हाँ, यह भारत की विशेषता है, इसी विशेषता को ध्यान में रखते हुए इस अंक में आपको संस्कृत और हिंदी के साथ-साथ गुजराती, मराठी, भोजपुरी, राजस्थानी, ब्रजभाषा, उर्दू और छत्तीसगढ़ी भाषा में भी रचनाएं पढ़ने को मिलेंगी। हमारा उद्देश्य साहित्य से सुसज्जित सभी विधाओं को आप तक पहुँचाना है। अच्छा साहित्य हमारे लिए अच्छे पोषण का काम करता है। हमारी चेतना हमारी मनःस्थिति को अनुकूल रूप में ढालता है। आज जहाँ मीडिया ने हमारी संस्कृति, हमारी सोच को मॉडर्न कहकर बिल्कुल बदल दिया हैं, वही एक प्रयास है कि एक अच्छा साहित्य परोसकर हम अपनी संस्कृति में आए बदलाव के प्रति जागरूकता उत्पन्न कर सके। हमारा उद्देश्य मात्रा नहीं अपितु गुणवत्ता प्रस्तुत करना है।
मैं आदरणीय नवीन चतुर्वेदी सर जी की आभारी हूँ जिन्होंने मुझे मेरे अन्दर एक नवीन शख्सियत को जानने का अवसर प्रदान किया।
आशा है कि आपको विविध रंगों को बिखेरता हुआ यह अद्यतन पसन्द आयेगा. आपकी बहुमूल्य राय की प्रतीक्षा रहेगी.
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