1 June 2014

इतनी भीड़ में तेरा चेहरा अच्छा लगता है - मुकेश आलम



इतनी भीड़ में तेरा चेहरा अच्छा लगता है
बीच समन्दर एक जज़ीरा अच्छा लगता है

मुद्दत गुज़री आज अचानक याद आए हो तुम
गहरी रात के बाद सवेरा अच्छा लगता है

तुमने अता फ़र्माया है सो मुझको है प्यारा
वर्ना किसको दिल में शरारा अच्छा लगता है

मैं तेरे दिल का तालिब और दैरो-हरम के वो
मुझको दरिया उनको किनारा अच्छा लगता है

सौदाईपागलआवारादीवानामजनूं
तुमने मुझको जो भी पुकारा अच्छा लगता है

तेरी रानाई से आँखें जाग उठीं जब से
तब से मुझको आलम सारा अच्छा लगता है

जज़ीरा=टापू। शरारा=अंगारा। तालिब=चाहने वाला।
दैरो-हरम=मंदिर-मस्जिद। रानाई=रोशनी/चमक।


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काव्य गुरु
प्रात: स्मरणीय परमादरणीय कविरत्न स्व. श्री यमुना प्रसाद चतुर्वेदी 'प्रीतम' जी

काव्य गुरु <br>प्रात: स्मरणीय परमादरणीय कविरत्न स्व. श्री यमुना प्रसाद चतुर्वेदी 'प्रीतम' जी
जन्म ११ मई १९३१
हरि शरण गमन १४ मार्च २००५

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