29 March 2014

हिमाचली गजल - इक्क जमोरड़ ऐब पुराणाँ सीह्स्से दा - द्विजेन्द्र द्विज

इक्क जमोरड़ ऐब पुराणाँ  सीह्स्से दा
छुटदा ई नी‍ सच्च गलाणाँ सीह्स्से दा

दर्पण का एक जन्मजात  पुराना ऐब है
दर्पण से सच कहने की आदत नहीं छूटती

तोड़ी नैं, भन्नी नैं, प’थराँ मारी नैं ?
दस्सा कीह्याँ सच्च छडाणाँ सीह्स्से दा

तोड़ कर? मरोड़कर? या पत्थर मार कर
बताइये दर्पण से सच कहने की लत छुड़वाई जाए।

अपणे चेहरे दा नीं झलणाँ सच्च मितराँ
प’थराँ ने थोब्बड़ छड़काणाँ सीह्स्से दा

मित्र अपने चेहरे का सच झेल नहीं पाते
लेकिन दर्पण का मुँह तोड़ देना चाहते हैं

किरचाँ दा एह ढेर तुसाँ जे दिक्खा दे
एह्त्थू इ था सै सैह्र पुराणाँ सीह्स्से दा

किरचों का ये ढेर जो आप देख रहे हैं
दर्पण का शहर भी यहीं कहीं था

कदी ता मितरो ! मूँह्यें अपणे भी पूँह्ज्जा
घड़-घड़ियें भी क्या लसकाणाँ सीह्स्से दा

मित्रों ! कभी तो अपना चेहरा भी साफ कीजिए
बार-बार  दर्पण का भी क्या साफ करेंगे ?

इट कुत्ते दा बैर ए सीह्स्से प’थरे दा
प’थराँ नैं क्या हाल सुणाणाँ सीह्स्से दा

दर्पण और पत्थर का ईंट और कुत्ते का बैर है
पत्थरों से  दर्पण का हाल कैसे कहें?

इक्क स्याणाँ माह्णूँ एह समझान्दा था
प’थराँ बिच नीं सैह्र बसाणाँ सीह्स्से दा

एक बुद्धिमान व्यक्ति यह समझाता था
पत्थरों के बीच दर्पणों का शहर नहीं बसाना चाहिए

भखियो तौन्दी अग्ग बर्हा दी पर अपणाँ
हर समियान्नाँ, ठोह्र-ठकाणाँ सीह्स्से दा

ग्रीष्म ऋतु अपने चरम पर है, आग बरस रही है
लेकिन हमारा तो हर शामियाना काँच का है

जे घड़ेया सैह भजणाँ भी ता था इक दिन
‘द्विज’ जी ! किह्तणाँ सोग मनाणाँ सीह्स्से दा

जो घड़ा (गढ़ा) गया था उसे एक दिन टूटना भी तो था
द्विज जी ! काँच के टूटने का कितना शोक मनाओगे

द्विजेंद्र द्विज

3 comments:

  1. मैंने पहले भी इस ग़ज़ल पर टिपण्णी की है जब इसे द्विज जी ने फेसबुक नोट्स के माध्यम से छापा था !पहाडी ग़ज़ल में द्विज जी का यह प्रयास बहत अच्छा है ! यहाँ पर जो अनुवाद /रूपांतरण किया गया है ,वह भी अच्छा है !

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  2. 'इक्क जमोरड़ ऐब पुराणाँ सीह्स्से दा' बड़ी छैळ ग़ज़ल जी। ग़ज़ल दे माहिर द्विज होरां दिया इसा ग़ज़ला जो मैं पहलें भी पढ़ेया। जित्तणी बरी पढ़ा बड़ा मजा ओंदा। छैळ भाव छैळ अक्खर। हिंदी नुवाद सोने पर सुहागा।

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  3. This comment has been removed by the author.

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