16 March 2013

रथ इधर मोड़िये - बृजनाथ श्रीवास्तव - समीक्षा : मयंक अवस्थी

अविस्मरणीय काल से मनुष्य की अभिव्यक्ति उस की चेतना और अनुभूति के संयोग अथवा द्वंद से जन्मती हुई, संगीत और कला के विविध रूपों में प्रकट होती रही है। समय, स्थान और सुसंस्कृति अनुरूप इस अभिव्यक्ति का कलेवर बदलता रहा है। जो अभिव्यक्ति मानव अंतस की यथार्थ एवं निष्कलुष गहराइयों को उकेरने में समर्थ होती है वह कालजयी भी होती है। सामवेद की ऋचाएँ निष्कलुष और पवित्र इसीलिये हैं कि वे चेतना के सूक्ष्म धरातलों तक पहुँचती हैं। यही कारण है कि भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है कि मैं वेदों में सामवेद हूँ।

कोई रचनाधर्मी जब अपनी अनुभूति की पराकाष्ठा पर पहुँचता है तो बहुधा उस की अभिव्यक्ति में वह ईश्वर तत्व आ जाता है जो किसी रचना को देशकाल की परिधि से ऊपर कर देता है। अभिव्यक्ति आयाम खोजती है। छायावादोत्तर हिन्दी काव्यजगत में नवगीत स्वरूप लेने लगा था और समकालीन कविता में इस के वर्चस्व
को स्वीकारा जा चुका है। विगत दो दशकों में नवगीत को सुसमृद्ध करने में जिन रचनाकारों ने भूमिका निभाई है उस में भाई ब्रजनाथ के महती योगदान से हिन्दी काव्य जगत सुपरिचित है ही। कोई भी रचनाधर्मी अपनी अभिव्यक्ति प्रतीकों और बिम्बों के माध्यम से अभिव्यक्त करना पसंद करता है। चित्रकला के क्षेत्र में अमृता शेरगिल ने बुडापेस्ट के गुम्बदों के माध्यम से अनेक शब्दातीत मानवीय मन:स्थितियों को जीवंत किया तो मक़बूल फिदा हुसैन ने मनुष्य के आहत स्वाभिमान, विप्लवी, मज़दूर, खोई अस्मिता की तलाश तथा मुक्ति की तड़प जैसी जटिल मन:स्थितियों को अपने प्रिय प्रतीक घोड़े के विविध रूपों का सहारा ले कर व्यक्त किया। ग़ज़लकारों में मुनव्वर राणा अपनी माँ के सतत सम्मोहन में बँधे रहते हैं जो कि उन की ग़ज़लों की पहिचान है वहीं कजलवाश  कभी भी अपने आईने से दूर नहीं होते।

अपने पिछले नवगीत संग्रह "दस्तखत पलाश के" के प्रकाशन के आठ वर्ष बाद "रथ इधर मोड़िए" गीत संग्रह ब्रजनाथ काव्य प्रेमियों को भेंट कर रहे हैं। इन के केनवास से साहित्य प्रेमी बखूबी परिचित हैं, सभी जानते हैं कि:- 
  • उन के होरी का नाम बुधई है
  • उन के गीत - गोदान में एक शिवपालगंज गुम्फित रहता है क्योंकि वे वस्तुस्थिति के मूक दृष्टा न रह कर उसे विश्लेषक की दृष्टि से देखते हैं।
  • कि परम्पराओं, जीवन मूल्यों, स्मृतियों और अभिलाषाओं की हरीतिमा से बने हुए ब्रजनाथ के सपनों के गाँव को निष्ठुर और मूल्यहीन राजनीति, दिशाहीन यांत्रिकीकरण तथा नैतिक पतन की पराकाष्ठा पर जीने वाले समकालीन समाज एक विघटनकारी विरूपक तत्वों से बना एक शहर धीरे-धीरे ग्रस रहा है।

अपने इस कैनवास पर ब्रजनाथ आशा-निराशा, युयुत्सा, अवसाद, उमंग तथा अस्वीकृति के आरोहों के साथ भोक्ता विश्लेषक तथा प्रवक्ता की भूमिका का सार्थक निवाह करते रहे हैं। यह संग्रह "रथ इधर मोड़िए"  इसीलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इस संग्रह में इन्होंने निर्णायक उद्घोषणा का नया स्वर जोड़ा है। छोड़िए मान्यवर .... रथ इधर मोड़िए .....  और सामाजिक परिवर्तन के प्रवक्ता की हैसीयत अख़्तियार करना आरंभ की है। संग्रह के गीत उन के अप्रतिम और विलक्षण शिल्प, सार्थक बिम्ब-विधान तथा सटीक संधान के सबूत हैं। बागवान को सही पता है  कविता में बाज को प्रतीक ले कर राजनीति के अपराधीकरण को चित्रित किया है। ग़ौरतलब पंक्तियाँ हैं : बागवान को सही पता है  इस व्यवस्था का पोषक और लाभार्थी राजनीतिज्ञ स्वयं ही इस समस्या की जड़ में है।

लट्ठ उगायेंगे ..... कविता गन्ने को ले कर बेहद खूबसूरत तरीके से कहा गया है कि कैसे निजी स्वार्थों का पोषक, निर्मम और बर्बर सामाजिक तंत्र हमारे जीवन को खण्ड-खण्ड कर उस का शोषण कर रहा है परंतु सामाजिक परिवर्तन के दौर में गीत के अंत में गन्ने का लट्ठ में बदलने का विचार कविता को एक अनूठा वैशिष्ठ्य प्रदान करता है।

एक डर पसरा हुआ है हर जगह ..... कविता वर्तमान के एकाकीपन और असुरक्षा का समर्थ चित्र खींचती है। 

जूता पहने पाँव में ...... कविता में पश्चिमोन्मुख अर्थव्यवस्था के दुष्परिणामों को इंगित किया गया है और गीत की अंतिम पंक्तियाँ पेड़ अपणीं काँटों वाले / बैठें किसी छांव में एक प्रभावी प्रश्नचिन्ह छोड़ जाती है।

जंगल की आव भगत में ..... कविता वैश्वीकरण पर सवाल खड़े करती है तो अपने अपने इंद्रप्रस्थ और युग प्रवर्तक चोंचले दौनों गीत अंधी स्वार्थपोषण राजनीति में पिसने वाले सर्वहारा की बेबसी का समर्थ दृश्य प्रस्तुत करते हैं। आज के अस्थाई किरदार की जो परंपरा पुरुषों पर भारी है क्योंकि वे क्षणिक स्वार्थपूर्ति के निमित्त हो जाते हैं परंतु श्रेष्ठ जीवन मूल्यों का क्षरण भी कर जाते हैं। इस समकालीन बोनसाई संस्कृति पर ब्रजनाथ करारा प्रहार करते हैं -

आज आँधियों के युग में
वे कितने पेड़ बचे

जिनके मीठे फल से रहती
लदी झुकी डाली
जेठ दुपहरी छाया की जो 
परसे थे थाली

आज मालियों को बाजारी
बौने पेड़ जँचे

माली है डरा हुआ ..... कविता आज की विरूपक शक्तियों के बीच शुभ्रजीवन मूल्यों का पुनर्प्रतिपादन चाहने वालों की मन:स्थितियों से अवगत कराती है तो गुलमोहर के वदन .... इस प्रकार के किरदारों को नमन करती है।

पीढ़ियाँ कल की .... कश्मीर की वर्तमान विडम्बना का चित्र है।
किस्से कहानी के .... नामक गीत में बुढ़ापे की नियतिजन्य भवितव्यता का अवसाद जर्जर वृक्ष को प्रतीक मान कर चित्रित किया गाय है।

जहाँ-जहाँ कोई स्वागत योग्य सामाजिक परिवर्तन दृष्टिगोचर होता है ब्रजनाथ आश्वस्त और उमंगमय हो जाते हैं। मंत्र अधरों पर ... कविता नारीमुक्ति पर उन के उल्लास को व्यक्त करती है। यूँ तो ब्रजनाथ की अंतर्प्रज्ञा अधिकांशत: समाज में अभी तक व्याप्त सामंती शक्तियों के पाश में पिसते सर्वहारा की तड़प के साथ संवेदना रखती है परंतु कहीं-कहीं वे प्रकृति के साथ एकाकार होते हैं उन के अंतस में युयुत्सा और विश्लेषण शांत हो जाते हैं और मानो वे ऐसे दृश्यों के शुद्ध भोक्ता बन जाते हैं। गंगोत्री, यक्षपरियों की कथाएँ, साथ में तुम रहो, द्वार की दस्तकें, भूले काला  गोरा है और अरी निदाघे जैसे गीतों में वासंती क्षणों को जीते हुये दिखाई देते हैं।

उन के संगग्रह के सभी गीत पठनीय हैं उन के वासंती एवं फागुनी गीत संग्रहणीय हैं। जहाँ ब्रजनाथ व्यवस्था से प्रश्न करते हैं ऐसे गीत यथा चलना मत चाल एवं रथ इधर मोड़िये अभिनंदनीय हैं। परंतु इस सबसे ऊपर इस संग्रह का प्रथम गीत मार्च जैसा दिसंबर लगा जिस में उन्होंने परिवार को मंदिर के रूप में देखा और मर्यादा मूल्यों पर अनन्तिम आस्था प्रकट की है, विशेष रूप से अभिनंदनीय है।

मैं कवि ब्रजनाथ ही नहीं बल्कि व्यक्ति ब्रजनाथ को भी जानता हूँ। ज़िंदगी एक व्यक्ति को कवि बनाने के लिए जो कुछ दे सकती है वह उन्हें भरपूर मिला है यानि जटिल पारिवारिक समीकरण, आभासी आत्मीयताएँ और जीवन के कदम-कदम पर सतत संघर्ष की नई-नई स्थितियाँ। परन्तु उन के अंदर एक अपराजेय सहिष्णु छिपा हुआ है जो उन की उद्दाम और प्रचंड नैसर्गिक काव्य क्षमता को निर्बाध जारी रखता है। सब कुछ विपरीत हो ब्रजनाथ अल्हड़ और बेलौस बने रहते हैं - किसी पहाड़ी झरने सरीखे। मुझे उन पर गर्व है। रथ इधर मोड़िए को अभिवादन सहित।

भ्रात्रवत
मयंक अवस्थी
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया, कानपुर
+91 87 652 13 905 

पुस्तक - रथ इधर मोड़िये
प्रकाशक - मानसरोवर - 9336818330
न्यौछावर - 200.00 

कवि सम्पर्क - shribnath@gmail.com, 9450326930 

1 comment:

  1. बहुत ही सशक्त समीक्षा, पुस्तक भी उतनी ही दमदार होगी।

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