4 March 2011

मन होवे मस्त मलंग

होली का हुड़दंग
खेल रहे सब ही जन मिल के
खोजत नव-नित रंग
........ भैया होली का हुड़दंग

गरिमा के 'गुलाल' को भूले
गाली गूँजें सदनों में
अदब 'अबीर' लुप्त दिखता, नहिं -
भेद बड़ों में अदनों में
केमीकल का असर हुआ ये
कान्ति दिखे ना वदनों में
तन देखो या मन देखो
सब के सब हैं बदरंग
........ भैया होली का हुड़दंग

अब की होली कुछ ऐसे हम -
खेलें, तो फिर आए मजा
'गुण' गुलाल चेहरों पे मल के
नाचें 'ढँग' के ढ़ोल बजा
'मनुहारों' की बंटे मिठाई
'सत्कारों' के साज सजा
गर ऐसा हो जाए तो
मन होवे मस्त मलंग
........ भैया होली का हुड़दंग


नवगीत की पाठशाला में प्रकाशित नवगीत

No comments:

Post a Comment