6 August 2016

बुझे हैं ऐसे कि हो कर भी नईं हुए रौशन - नवीन

बुझे हैं ऐसे कि हो कर भी नईं हुए रौशन
न जाने किस के हुनर से चराग़ थे रौशन
जो उस का काम है उस ने वही किया साहब
बुझे हुओं को जला कर बुझा-दिये……. रौशन
शबे-विसाल तो आँखों पे ख़्वाब हावी थे
शबे-फ़िराक़ भी दीदे न हो सके रौशन
किसी के दिल में जो सपने थे, इक इशारे पर
हमारी पलकों से झर-झर के हो गये रौशन
दुआएँ ऐसे ही दी जाती हैं मुहब्बत में
उदासियों का ठिकाना सदा रहे रौशन
हम उस असर के बशर हैं जिसे सितमगर ने
इनायतों में नवाज़े अनासिरे-रौशन
कुछ ऐसे झूल रहे हो ‘नवीन’ तुम जैसे
तुम्हारे शानों पे रक्खे हों क़ाफ़िये रौशन
नवीन सी. चतुर्वेदी

बहरे मुजतस मुसमन मख़बून महज़ूफ
मुफ़ाइलुन फ़इलातुन मुफ़ाइलुन फ़ेलुन
1212 1122 1212 22




No comments:

Post a Comment

नई पुरानी पोस्ट्स ढूँढें यहाँ पर

काव्य गुरु
प्रात: स्मरणीय परमादरणीय कविरत्न स्व. श्री यमुना प्रसाद चतुर्वेदी 'प्रीतम' जी

काव्य गुरु <br>प्रात: स्मरणीय परमादरणीय कविरत्न स्व. श्री यमुना प्रसाद चतुर्वेदी 'प्रीतम' जी
जन्म ११ मई १९३१
हरि शरण गमन १४ मार्च २००५

My Bread and Butter

यहाँ प्रकाशित सभी सामग्री के सभी अधिकार / दायित्व तत्सम्बन्धित लेखकाधीन हैं| अव्यावसायिक प्रयोग के लिए स-सन्दर्भ लेखक के नाम का उल्लेख अवश्य करें| व्यावसायिक प्रयोग के लिए पूर्व लिखित अनुमति आवश्यक है|

साहित्यम पर अधिकान्शत: छवियाँ साभार गूगल से ली जाती हैं। अच्छा-साहित्य अधिकतम व्यक्तियों तक पहुँचाने के प्रयास के अन्तर्गत विविध सामग्रियाँ पुस्तकों, अनतर्जाल या अन्य व्यक्तियों / माध्यमों से सङ्ग्रहित की जाती हैं। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री पर यदि किसी को किसी भी तरह की आपत्ति हो तो अपनी मंशा विधिवत सम्पादक तक पहुँचाने की कृपा करें। हमारा ध्येय या मन्तव्य किसी को नुकसान पहुँचाना नहीं है।