31 July 2014

सोरठे – नवीन सी. चतुर्वेदी

 कन्या का कौमार्य - उस का ही जिम्मा नहीं।
सुनो गौर से आर्य! - ये हम पर भी फ़र्ज़ है॥

हरिक सार का सार - दो बातों में है निहित।
मधुकर की मनुहार - और कली का उन्नयन॥

सच पर नहीं विवाद - किन्तु झूठ ये भी नहीं।
हरिश्चन्द्र के बाद - सत्यवादिता कम हुई॥

डीजल वाली नाव - जब से हम खेने लेगे।
मत्स्य-मनस के घाव - दिन-दूने बढ़ने लगे॥

भरते हैं आलाप - मन-मृदंग सँग हर सुबह।
घोड़ों की पदचाप - बायसिकिल की घण्टियाँ॥

क्या बतलाऊँ यार - पहले हर दिन पर्व था।
पर अब तो त्यौहार - भी लगते हैं बोझ से॥

वो अपना अवसाद - भला भूलते किस तरह।
बारह वर्षों बाद - जिन को लाक्षागृह मिला॥

निष्कासन के तीर - ले कर सब तैयार हैं।लंका वाली पीर - कोई भी हरता नहीं॥

कैसे होती बन्द - पुरखों की छेड़ी बहस।
हम बोले मकरन्द - वो पराग पर अड़ पड़े॥

:- नवीन सी. चतुर्वेदी

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