31 July 2014

व्यंग्य पेड़ों से जुड़े उद्योग- एक ताज़ा रिपोर्ट - कमलेश पाण्डेय

पेड़ या वृक्ष देश के विशेष संसाधन हैं. इनका तना, इनकी छाल, शाखा और जड़ें सब देश की ही  संपत्ति हैं. पेड़ इतने उपयोगी पदार्थ हैं कि देश का इनके बिना चल ही नहीं सकता, हालांकि ये खुद बेचारे अपनी जड़ें थामे एक ही जगह तब तक खड़े रहते हैं जबतक कोई इन्हें काट कर आरा मशीन तक के सफ़र पर न ले जाए.

मनुष्य जाति के विकास में पेड़ सदियों से वरदान साबित हुए हैं. इन्हें काटने और उगाने दोनों क्रियाओं में विकास छुपा होता है. पेड़ आदमी के लिए प्रकृति और पर्यावरण से प्यार जताने का सबसे आसान जरिया हैं क्योंकि ये उनके आस-पास ही खड़े मिल जाते हैं. भारत में तो पेट-पूजा के बाद एक आम क्रिया है पेड़-पूजा. धर्म-ग्रंथों के अनुसार नन्हें-से तुलसी के झाड से लेकर विराट आकार के बरगद तक सब पूजनीय हैं. उधर आधुनिक विकास-ग्रंथों में भी लिखा है कि दो-चार पेड़ लगा देने से पर्यावरण के खिलाफ किये गए सारे पाप धुल जाते हैं. पेड़ ही आदमी के लिए गुलिस्तान रचते हैं, और पेड़ की ही किसी शाख पर बैठ कर एक उल्लू कभी-कभी उस गुलिस्तान को बर्बाद कर देता है. पेड़ शायरों के भी काम आते हैं जिनकी जुबान में इन्हें दरख़्त या शज़र वगैरह कहा जाता है. ज़ाहिर है पेड़ इश्क़-मुहब्बत को भी छाँव देते हैं. पेड़ों की छाल पर अपना नाम गोदने के अलावा प्रेमी लोग इसके गिर्द लिपटना या गाना भी पसंद करते हैं. 

पेड़ बड़े प्रेरणा-दायी होते हैं. इनके विशाल, धीर और मज़बूती से जमे रहने की प्रकृति से लोग श्रद्धानुसार प्रेरित होते रहते हैं. एक नेता को अपनी जड़ें जमा कर बैठने और भीतर ही भीतर उन्हें फैलाते जाने का आईडिया पेड़ों से ही मिलता है. उधर गरीब जनता को भी पेड़ों की डालियों पर कब्ज़ा जमाये बैठे पशु-पक्षियों के घोंसले देख कहीं भी छप्पर डाल कर झोंपड़-पट्टी बना लेने की प्रेरणा मिलती है.

पेड़ का ढांचा लकड़ी का होता है, जिसकी डालियाँ अक्सर झूला झूलने जैसे दीगर किस्म के काम आती रही हैं. पर हमारे देश का कुटीर उद्योग तो मानों पेड़ों के हर अंग का मोहताज है. हमारे मकान के चौखट-दरवाज़े से लेकर कुर्सी-टेबल-पलंग सबमें ये लकड़ी ही काम आती है. फल-फूल, पत्ते, तिनके, छालें सब आदमी किसी न किसी काम के लिए समेट लेता है. इधर पेड़ सम्बन्धी उद्योग में एक जड़ता-सी आ रही थी कि अपने देश के एक प्रदेश में पेड़ की डाल का एक नया उपयोग देखने में आया. कुछ उद्यमियों ने इन डालियों पर लड़कियां लटकाने का व्यापक स्तर पर प्रयोग कर उद्योग को नई दिशा दी. इससे वहां समाज में काफी उत्साह का माहौल पैदा हुआ है. हालांकि इस उद्यम को कानूनी मान्यता नहीं है, पर उत्साही जन इसे चोरी-छुपे उसी तरह संपन्न कर रहे हैं जैसे हमारे देश में आम तौर पर लघु-उद्योग किये जाते हैं. आखिर एक उद्योग जमाने के लिए चाहिए क्या, ज़रा सी हिम्मत और थोडा पुलिस-प्रशासन का सहयोग. सूत्रों के अनुसार प्रदेश सरकार इस नई गतिविधि में विकास की नई संभावनाएँ देख रही है. उसका मानना है कि इस उद्योग को कानूनी तौर पर प्रोत्साहन तो नहीं दिया जा सकता पर अगर कोई इसे करना ही चाहे तो कुछ विनियमन-नियंत्रण के अधीन कर ले. विकास के लिए प्रतिबद्ध और युवाओं को इसके लिए उकसाने को प्राथमिकता देने वाली सरकार मानती है कि युवाओं में काफी ऊर्जा होती है और उनकी गलतियों तक में विकास की संभावनायें छुपी होती है.

जैसा कि स्पष्ट है जिस पेड़ की डाली पर ये उद्यम किया जाता है उस पेड़ और आस-पास के इलाके के सार्वजनिक महत्त्व में ढेर सारी वृद्धि हो जाती है. इस पेड़ को उसे देखने वालों की भीड़ समेत टीवी और अखबारों पर लगातार दिखाया जाता है जिससे एक अन्यथा पिछड़े इलाके में वह एक अल्प-कालिक पर्यटन-स्थल की हैसियत पा लेता है. ये सरकार के संज्ञान में है कि कई ऐसे पेड़ों के आस-पास का स्थल मेले या पर्यटन के लिहाज से विकास के उपयुक्त नहीं होता है. इसलिए जहां-तहां इस उद्यम को संपन्न करने की बजाय यदि प्रशासन द्वारा प्राधिकृत पेड़ों को ही चुना जाय तो बेहतर होगा. इस काम के लिए हरेक जनपद में थानेदार की अध्यक्षता में एक अनौपचारिक प्राधिकरण बनाया जा सकता है. पेड़ चुनने का आधार सरल होगा- जैसे पेड़ किसी झुरमुट में न हो और उसके इर्द-गिर्द इतनी जगह हो कि बीस-तीस न्यूज़-चैनलों की गाड़ियां, दो-चार हज़ार लोगों का धरना और अफसोस जताने आये नेताओं और उनके समर्थक सब समा जाएँ. पास से कोई पक्की सड़क गुजरती हो तो ऐसे पेड़ को प्राथमिकता मिले. हमारे यहाँ सब प्रकार के उद्यमी मौजूद हैं. जैसे एक बड़ी फैक्टरी के गिर्द ढेरों छोटी फैक्टरियां उग आती हैं, यहाँ भी संभावना दिखते ही लोग काम-चलाऊ पर्यटन इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा कर लेंगे. अपने देश में जगह हो तो मेले और मजमें का समाँ कहीं भी बंध जाता है.

प्रदेश के शासकीय गलियारों में आशा व्यक्त की जा रही है कि वहां के युवा उद्यमी पुरुष अपने नेताओं से प्रेरणा लेकर नियमित रूप से निर्धारित पेड़ों पर लड़कियां लटकाने का उद्योग जारी रखेंगे, ताकि प्रदेश के विकास को नई दिशा और युवा की ऊर्जा को नया निकास मिल सके.

कमलेश पाण्डेय - 9868380502

1 comment:

  1. वाह कमलेश साहब वाह !! एक बेहद सारगर्भित और प्रभावी व्यंग्य के लिये आभार और शुभकामनाये -- पेडों के नीचे उपनिषद बोले और लिखे जाते थे – सिद्धार्थ को बुध्ध बनने की प्रक्रिया पेड के नीचे ही सम्पन्न हुई - आज़ादी से पहले अंग्रेज़ जो थे वो क्रंतिकारियों को फाँसी देने के लिये पेडों का इस्तेमाल करते थे और जिन फैक्ट्रियों का आपने ज़िक्र किया वो सब ऐसे पेडों के इर्द गिर्द स्थापित भी हो चुकी हैं –लेकिन उ प्र मे नया कुटीर उद्योग पेडों पर लडकियाँ लटकाने के बाद –टी वी चैनलों –विरोधियों और पत्र पत्रिकाओ को मिलने वाले टी आर पी बोनस से सम्बद्ध है—वहाँ की संवेदनशील सरकार ने इन टी वी चैनलों –विरोधियों और पत्र पत्रिकाओ को जो मसाला जुटाने मे मदद दी है उसके लिये ये सरकार भूरि भूरि प्रशंसा की पात्र है !! –मयंक

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