9 September 2011

आवाज़ की जगह तो स्विचों ने संभाल ली - नवीन

वो बात क्या कि जिस में हक़ीक़त बयाँ न हो |
वो शे'र क्या कि जिस पे समय का निशां न हो |१|

कर देगा सूर्य भस्म हमें इक सेकंड में |
फैला हमारे सर पर अगर आसमाँ न हो |२|

'विनिवेश' वक़्त की है ज़रूरत, कुबूल है |
पर यह गुलामियत का नया तर्जुमाँ न हो |३|

मंदी में और पुख्ता  हुई है हमारी सोच |
उपलब्धि है ये, इस पे हमें क्यूँ गुमाँ  न हो |४|

आवाज़ की जगह तो स्विचों ने संभाल ली |
कल आने वाली नस्ल कहीं बेज़ुबाँ न हो |५|

उम्मीद करता हूँ कि कठिन बहर और ट्रेडीशनल काफ़ियों का प्रयोग करते हुए ozon, disinvestment, recession और technology की अंधी होड पर कहे गए ये अशआर आप लोगों को ज़रूर पसंद आएंगे|

मफ़ऊलु फाएलातु मुफ़ाईलु फाएलुन
221 2121 1221 212
बहरे मुजारे मुसमन अखरब मकफूफ़ महजूफ

1 comment:

  1. दादा हैड्स ऑफ ऐसे गजलें तो आप ही कह सकते हैं पुराने लिफाफे में इस हद तक नया मजमून हो सकता है कभी सोचा न था । आपकी प्रयौगधर्मिता को प्रणाम ।।

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