31 July 2014

3 ग़ज़लें इरशाद खान सिकन्दर


रूह से तोड़के सबने बदन से जोड़ दिया

रिश्ता-ए-इश्क़ के धागे को धन से जोड़ दिया

है मिरा काम मुहब्बत की पैरवी करना

जबसे इक चाँद ने मुझको किरन से जोड़ दिया

मैं उसे ओढ़के फिरता था दश्त भर लोगो

क्यों मिरा जिस्म किसी पैरहन से जोड़ दिया

वक़्त ने तोड़ दिया था मगर तअज्जुब है

आपने दिल को मिरे इक छुअन से जोड़ दिया

मेरी ग़ज़लों ने मुहब्बत की नींव रक्खी है

बेवतन जो था उसे भी वतन से जोड़ दिया

शह्र के लोगों को ये बात नागवार लगी

गाँव का दर्द भी हमने सुख़न से जोड़ दिया

अब तो लाज़िम है सियासत के कुछ हुनर सीखें

शाह ने हमको भी इक अंजुमन से जोड़ दिया





कल रात पूरी रात तिरी याद आई है
जानाँ ये मेरे इश्क़ की पहली कमाई है


मैं इन दिनों हूँ हिज्र की लज़्ज़त में मुब्तला
इक उम्र काम करके ये तनख़्वाह पाई है


हाज़िर हूँ अपने दिल की मैं खाता-बही के साथ
ये मैं हूँ और ले ये तिरी पाई-पाई है


ख़ारिज सिरे से कर दिया सबकी दलील को
जब भी चलाई इश्क़ ने अपनी चलाई है 

तकिये का हाल देखके लगता है रातभर
सब आँसुओं ने ख़्वाब की बरसी मनाई है


जबसे सुना कि इश्क़ तिजारत मुफ़ीद है
हमने भी दिल दिमाग़ की पूँजी लगाई है


शाइस्तगी बनी ही मिरे ख़ानदान से
लहजे में ये मिठास बुज़ुर्गों से आई है


इक पल भी इस जहान से निभनी मुहाल थी
हमने किसी के इश्क़ में जग से निभाई है


तस्वीर का ये रुख भी सिकन्दहै क्या अजब

जब रंग उड़ गया तो ग़ज़ल रंग लाई है

बहरे मज़ारिअ मुसमन अख़रब मकफूफ़ मकफूफ़ महज़ूफ़
मफ़ऊलु फ़ाइलातु  मुफ़ाईलु फ़ाइलुन
 221 2121 1221 212 



तेरे अल्फ़ाज़ के पत्थर मिरे सीने पे लगे
मेरे अहसास के टुकड़े मिरे चेहरे पे लगे


हमने उनको भी कलेजे से लगा रक्खा है
संग जो भी हमें महबूब के सजदे पे लगे

इतना सुनने से तो अच्छा था कि मर ही जाता
मेरी आवाज़ पे पहरे तिरे कहने पे लगे


मैं तिरे इश्क़ में ऐसा हूँ तो ऐसा ही सही
लगे इलज़ाम अगर तौर तरीक़े पे लगे


इश्क़ ने तेरी बहाली की बिना रक्खी है
देखियो! कोई न धब्बा तिरे ओहदे पे लगे


इससे पहले तो ज़मीं थी, वो फ़लक था, दिल था
ये तो दीवार से हम आपके आने पे लगे


क्या नज़ारा था गले आज लगे वो ऐसे
जैसे जुमला कोई आकर किसी जुमले पे लगे


वो तो हम थे जो कभी आह क्या उफ़ तक भी न की
जब कि सब तीर तिरे सीधे कलेजे पे लगे


टस से मस भी जो हुआ मैं तो सिकंदरकैसा

लाख कैंची मिरे मज़बूत इरादे पे लगे
बहरे रमल मुसम्मन मख़बून महज़ूफ़
फ़ाइलातुन फ़इलातुन फ़इलातुन फ़ेलुन
2122 1122 1122 22

:- इरशाद खान सिकन्दर 
– 9818354784

No comments:

Post a Comment

यहाँ प्रकाशित सभी सामग्री के सभी अधिकार / दायित्व तत्सम्बन्धित लेखकाधीन हैं| अव्यावसायिक प्रयोग के लिए स-सन्दर्भ लेखक के नाम का उल्लेख अवश्य करें| व्यावसायिक प्रयोग के लिए पूर्व लिखित अनुमति आवश्यक है|

साहित्यम पर अधिकान्शत: छवियाँ साभार गूगल से ली जाती हैं। अच्छा-साहित्य अधिकतम व्यक्तियों तक पहुँचाने के प्रयास के अन्तर्गत विविध सामग्रियाँ पुस्तकों, अनतर्जाल या अन्य व्यक्तियों / माध्यमों से सङ्ग्रहित की जाती हैं। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री पर यदि किसी को किसी भी तरह की आपत्ति हो तो अपनी मंशा विधिवत सम्पादक तक पहुँचाने की कृपा करें। हमारा ध्येय या मन्तव्य किसी को नुकसान पहुँचाना नहीं है।

My Bread and Butter