30 April 2014

उस का ख़याल आते ही मञ्ज़र बदल गया - रऊफ़ रज़ा

उस का ख़याल आते ही मञ्ज़र बदल गया
मतला सुना रहा था कि मक़्ता फिसल गया
मञ्ज़र - दृश्य

 बाजी लगी हुयी थी उरूजो-ज़वाल की
मैं आसमाँ-मिज़ाज ज़मीं पर मचल गया
उरूजो-ज़वाल = चढ़ाव-उतार

चारों तरफ़ उदास सफ़ेदी बिखर गयी
वो आदमी तो शह्र का मञ्ज़र बदल गया 

तुम ने जमालियात बहुत देर से पढ़ी
पत्थर से दिल लगाने का मौक़ा निकल गया 
जमालियात - सौदर्य सम्बन्धित

सारा मिज़ाज नूर था सारा ख़याल नूर
और इस के बावजूद शरारे उगल गया

: रऊफ़ रज़ा
9811326547

बहरे मज़ारिअ मुसमन अख़रब मकफूफ़ मकफूफ़ महज़ूफ़
मफ़ऊलु फ़ाइलातु  मुफ़ाईलु फ़ाइलुन
 221 2121 1221 212

5 comments:

  1. वाह वाह !

    शानदार ग़ज़ल है...
    मुबारकबाद !

    ReplyDelete
  2. This comment has been removed by the author.

    ReplyDelete
    Replies
    1. ग़ज़ल की नावल्टी और रवानी देखते बनती है !! रऊफ़ भाई बैसे भी स्टार शाइर हैं धूम रहती है उनकी !!
      तुम ने जमालियात बहुत देर से पढ़ी
      पत्थर से दिल लगाने का मौक़ा निकल गया

      सारा मिज़ाज नूर था सारा ख़याल नूर
      और इस के बावजूद शरारे उगल गया

      क्या खूब शेर हैं !! क्या खूब !!! एक शेर इस गज़ल के सम्मान मे --
      उस दिन से ख़ामुशी के हुये हम असीर यूँ
      जिस दिन हक़ीर लफ़्ज़ ज़ुबाँ से फिसल गया –मयंक

      Delete
  3. This comment has been removed by the author.

    ReplyDelete
  4. बेहतरीन गजल है रौफ़् साहब।

    ReplyDelete

यहाँ प्रकाशित सभी सामग्री के सभी अधिकार / दायित्व तत्सम्बन्धित लेखकाधीन हैं| अव्यावसायिक प्रयोग के लिए स-सन्दर्भ लेखक के नाम का उल्लेख अवश्य करें| व्यावसायिक प्रयोग के लिए पूर्व लिखित अनुमति आवश्यक है|

साहित्यम पर अधिकान्शत: छवियाँ साभार गूगल से ली जाती हैं। अच्छा-साहित्य अधिकतम व्यक्तियों तक पहुँचाने के प्रयास के अन्तर्गत विविध सामग्रियाँ पुस्तकों, अनतर्जाल या अन्य व्यक्तियों / माध्यमों से सङ्ग्रहित की जाती हैं। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री पर यदि किसी को किसी भी तरह की आपत्ति हो तो अपनी मंशा विधिवत सम्पादक तक पहुँचाने की कृपा करें। हमारा ध्येय या मन्तव्य किसी को नुकसान पहुँचाना नहीं है।

My Bread and Butter