5 January 2014

ज़र्रे-ज़र्रे में मुहब्बत भर रही है - नवीन

ज़र्रे-ज़र्रे में मुहब्बत भर रही है। 
क्या नज़र है और क्या जादूगरी है॥

प्यार के पट खोल कर देखा तो जाना। 
दिल हिमालय, ख़ामुशी गंगा नदी है॥

हम तो ख़ुशबू के दीवाने हैं बिरादर। 
जो नहीं दिखती वही तो ज़िन्दगी है॥

किस क़दर उलझा दिया है बन्दगी ने। 
उस को पाएँ तो इबादत छूटती है॥

ये अँधेरे ढूँढ ही लेते हैं हम को। 
इन की आँखों में ग़ज़ब की रौशनी है॥

एक दिन हम ने गटक डाले थे आँसू। 
आज तक दिल में तरावट हो रही है॥







:- नवीन सी. चतुर्वेदी

बहरे रमल मुसद्दस सालिम
फ़ाइलातुन  फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन

2122 2122 2122

2 comments:

  1. काफिया ई दुरुस्त है सभी में परन्तु ..पूरा शब्द काफिया न होने से ग़ज़ल में सहज प्रवाह नहीं है...

    ReplyDelete

यहाँ प्रकाशित सभी सामग्री के सभी अधिकार / दायित्व तत्सम्बन्धित लेखकाधीन हैं| अव्यावसायिक प्रयोग के लिए स-सन्दर्भ लेखक के नाम का उल्लेख अवश्य करें| व्यावसायिक प्रयोग के लिए पूर्व लिखित अनुमति आवश्यक है|

साहित्यम पर अधिकान्शत: छवियाँ साभार गूगल से ली जाती हैं। अच्छा-साहित्य अधिकतम व्यक्तियों तक पहुँचाने के प्रयास के अन्तर्गत विविध सामग्रियाँ पुस्तकों, अनतर्जाल या अन्य व्यक्तियों / माध्यमों से सङ्ग्रहित की जाती हैं। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री पर यदि किसी को किसी भी तरह की आपत्ति हो तो अपनी मंशा विधिवत सम्पादक तक पहुँचाने की कृपा करें। हमारा ध्येय या मन्तव्य किसी को नुकसान पहुँचाना नहीं है।

My Bread and Butter