27 November 2011

हरिगीतिका - समापन पोस्ट - रसधार छंदों की बहा दें, बस यही अनुरोध है

सभी साहित्य रसिकों का सादर अभिवादन 


2 अक्तूबर २०११ को शुरू हुआ यह हरिगीतिका वाला आयोजन आज पूर्णता को प्राप्त हो रहा है। इस आयोजन में अब तक हम १४ रचनाधर्मियों के ७५ हरिगीतिका छंद पढ़ चुके हैं, जो कि इस पोस्ट के साथ हो जाएँगे १५ - ७८। आइये पहले पढ़ते हैं अम्बरीष भाई के छंद :-

अम्बरीष श्रीवास्तव

मधु छंद सुनकर छंद गुनकर, ही हमें कुछ बोध है।
सब वर्ण-मात्रा गेयता हित, ही बने यह शोध है।।

अब छंद कहना है कठिन क्यों, मित्र क्या अवरोध है।
रसधार छंदों की बहा दें, बस यही अनुरोध है।१।


यह आधुनिक परिवेश, इसमें, हम सभी पर भार है।
यह भार भी भारी नहीं, जब, संस्कृति आधार  है।।

सुरभित सुमन सब हैं खिले, अब, आपसे मनुहार है।
निज नेह के दीपक जलायें, ज्योति का त्यौहार है।२।


सहना पड़े सुख दुःख कभी, मत भूलिए उस पाप को।
यह जिन्दगी है कीमती, अब, छोडिये संताप को।।

अभिमान को भी त्यागिये, तब, मापिये निज ताप को।
तब तो कसौटी पर कसें हम, आज अपने आप को।३।


अम्बरीष भाई पिछले कुछ हफ्तों से कुछ अति आवश्यक कार्य में व्यस्त हैं, फिर भी मंच पर अपनी उपस्थिति बनाए रखने के लिए उन्होंने ये मनोहारी छंद भेजे हैं।

अपनी बात -

समस्या पूर्ति मंच द्वारा आयोजित इस महायज्ञ के पहले फेज में अब तक हमें प्रफुल्लित कर चुके हैं कुल जमा ३४ कवि / कवयित्रियाँ और हम लोग पढ़ चुके हैं उन के ३२० छंद। निस्संदेह बहुत ही आनंद दायक बात है ये, खास कर आज के दौर में। रचनाधर्मियों और पाठकों के निरंतर सहयोग के बिना यह संभव नहीं था। 

मुझे याद है वो दिन जब उमा शंकर चतुर्वेदी उर्फ़ कंचन बनारसी जी की चौपाइयाँ आयीं थीं, मेल के माध्यम से। बहुत खुश हुआ था उस दिन। तब से अब तक कई लोगों से इन के बारे में पूछा, इन को मेल्स भेजे, पर इन से संवाद नहीं हो पाया। आज फिर से सच्चे हृदय से उन का आभार व्यक्त करता हूँ। 

शनै: शनै: जैसे एक-एक बूँद से गागर भरती है, बड़े-छोटे सभी रचनाधर्मियों ने अपने-अपने छंदों से इस मंच के प्रयास को सार्थकता प्रदान की। विशेष आभार उन व्यक्तियों का जिन्होंने जीवन में पहली बार छंद लिखे।

चूँकि एक साथ एक से अधिक ब्लॉग चलाने में बाधाएँ आ रही हैं, इसलिए आने वाले दिनों में समस्या पूर्ति मंच को भी ठाले-बैठे ब्लॉग के साथ merge कर दिया जाएगा। आने वाले आयोजन वहीं पर होंगे। आने वाले दिनों में ये भी देखने की इच्छा रहेगी, कि :-
  • मंच पर छंद प्रस्तुत करने वाले व्यक्ति अपने ब्लोग्स पर या अन्यत्र कितनी बार छंद लगाते हैं
  • छंद लिखते - छापते समय उन्हें संकोच तो नहीं हो रहा
  • छंद लिख कर पोस्ट करते समय उस छंद का नाम लिख रहे हैं या नहीं
  • क्या वो अपनी इस कला को अन्य व्यक्तियों के साथ बाँट रहे हैं
छंदों पर प्रारम्भिक कार्य हो चुका है। अब दूसरे फेज की शुरुआत से पहले साथियों की रुचि देखनी ज़रूरी है। इस दौरान हमारा प्रयास है कि समस्या पूर्ति मंच के अब तक के पाँचों आयोजनों में प्रस्तुतियाँ दे चुके कवि-कवयित्रियों के परिचय, उन के छंद, समस्या पूर्ति विधा और इस आयोजन के पाँचों  [रोला भी ले लें तो छहों] छंदों पर कुछ आलेख ले कर एक पुस्तक का प्रकाशन किया जाये। इस पुस्तक को ले कर पैसा न तो कमाना है - न लगाना है। कोई अन्य विकल्प न मिला तो - ई-क़िताब ज़िन्दाबाद।

एक बार फिर से हर उस व्यक्ति का सहृदय कोटि-कोटि आभार जिस ने प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से मंच का सहयोग किया। फिर मिलेंगे।


जय माँ शारदे!

19 comments:

  1. हरिगीतिका की समापन किश्त बहुत अच्छी लगी |
    बधाई |
    आशा

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  2. अम्बरीष जी !! सभी छन्दों में बाद की 2-2 पंक्तियाँ बहुत अच्छी लगीं -- विशेष रूप से --
    अभिमान को भी त्यागिये, तब, मापिये निज ताप को।
    तब तो कसौटी पर कसें हम, आज अपने आप को--बहुत सुन्दर कथ्य और प्रस्तुतीकरण है !!
    नवीन भाई !! आपका आयोजन सफल रहा !! बहुत खूबसूरत छ्न्द पढने को मिले !! आयोजन तो बहुत होते हैं लेकिन जिस सन्दर्भ और जिस निष्ठा से आपने इसे आरंभ किया आगे बढाया और सम्पन्न किया उसके लिये आप कोटिश: बधाई के पात्र है!!! यह सफर ऐसे ही जारी रहना चाहिये !! शुभकामनायें !!!

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  3. अम्बरीष जी तो छंदों के उस्ताद हैं। उनके छंदों की जितनी तारीफ़ की जाय कम है। बहुत बहुत बधाई उन्हें इन शानदार हरिगीतिका छंदों के लिए।

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  4. अम्बरीष जी, बधाई, इस सुंदर हरिगीतिका के लिए।

    नवीन जी, छंदों के प्रति आपकी अनुकरणीय नेकनीयती को नमनं।
    आपका यह स्तुत्य प्रयास सफल हो।
    अशेष शुभकामनाएं।

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  5. अभिमान को भी त्यागिये, तब, मापिये निज ताप को।
    तब तो कसौटी पर कसें हम, आज अपने आप को

    आदरणीय अम्बरीषजी को सुन-सुन कर मात्रिक छंद लिखना शुरू किया हूँ. आपका साहित्यिक योगदान अमूल्य है. हार्दिक बधाई.


    यह फेज समाप्त हुआ, तो फिर नूतन की प्रतीक्षा. समय रुकता कहाँ है.. चरैवेति चरैवेति .. का गान अपने वाङ्मय यूँहीं तो करते नहीं.

    आपकी संलग्नता और आपका सद्-प्रयास हिन्दी साहित्य के संवर्धन में महती भूमिका निभा रहा है, नवीनभाई.
    शुभेच्छा.

    --सौरभ पाण्डेय, नैनी, इलाहाबाद (उप्र)

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  6. छंद का ज्ञान जरूर देते रहिए, अभी हमें बहुत कुछ सीखना है। अब आपकी ठाले-बैठे पर ही जाएंगे। लेकिन आपकी अगली कक्षा का इंतजार करेंगे।

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  7. बहुत ज्ञानवर्धक और आनन्ददायी रही श्रंखला...

    अम्बरीष जी को पढ़कर आनन्द आया.

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  8. नवीन जी इस आयोजन के लिये बधाए के पात्र हैं ....
    ---अम्बरीष जी के सुन्दर छंद..बधाई..

    "यह भार भी भारी नहीं, जब, संस्कृति आधार है।।"..= २७ मात्रायें।

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  9. एक बहुत अच्छी शृंखला का समापन … मन कुछ भारी है ।
    यद्यपि आप शीघ्र ही नया आयोजन ले आएंगे , उसकी उत्साह सहित प्रतीक्षा भी है … नवीन जी !

    वातायन को ठाले बैठे के साथ पहले ही merge कर चुके अब समस्यापूर्ति मंच को भी !!
    आप स्वयं इतना विपुल मात्रा में सृजन करते हैं , समझा जा सकता है कि रचनाओं की कमी जैसी तो कोई समस्या है नहीं … … …

    आप यथासुविधा जो करें … सार्थक ही होगा ।


    रही बात अम्बरीष जी द्वारा रचित हरिगीतिकाओं की …
    अच्छी हैं … लेकिन धमाकेदार नहीं । अम्बरीष जी भी समर्थ छंद साधक और छंद का मर्म समझने वाले रचनाकार हैं … उनकी लेखनी में और प्रभावशाली लेखन की सामर्थ्य मानता हूं …

    लेकिन इसका यह अर्थ कतई नहीं कि छंद साधारण अथवा त्रुटिपूर्ण हैं । तीनों हरिगीतिकाओं के लिए उन्हें बधाई है !

    # डॉ.श्याम गुप्त जी संस्कृति के सं की एक ही मात्रा गिन रहे हैं , इस लिए स्वयं वे चूक रहे हैं । इस शृंखला में डॉ.श्याम गुप्त जी पहले भी मात्रा गिनने में एक अन्य पोस्ट पर ( शायद झंझट जी वाली ) चूक कर चुके हैं ।

    ए और अं की मात्रा वाले शब्दों को शिल्प-प्रवाह के अनुसार यथाआवश्यकता लघु अथवा गुरु गिना जाता है , गिना जाता रहा है , गिना जा सकता है । लय और प्रवाह को पहचानना होता है ।

    पुनः एक सुंदर आयोजन के लिए बधाई और मंगलकामनाएं !

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  10. धन्यवाद एवं आभार के सच्चे हकदार तो आप हैं नवीन जी कि आपने हम जैसे अनुभवहीन रचनाधर्मियों को छंदों के विधि विधान एवं अनुशासन से परिचित कराया ! मुझे इस बात का मलाल है कि मैं विलम्ब के साथ इस मंच से जुड़ी! भविष्य में भी आप इसी तरह से मार्गदर्शन करते रहेंगे यही अपेक्षा है ! अम्बरीश जी के हरिगीतिका छंद बहुत सुन्दर लगे ! उन्हें बहुत बहुत बधाई !

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  11. ये छंद बहुत अच्छी लगे |बधाई |
    आशा

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  12. बधाई नवीन जी इस सफल आयोजन पे ... कमाल के छंद का सिलसिला रहता है आपके ब्लॉग पे ...

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  13. नवीन भाई,

    सब से पहले तो आप को बहुत बहुत शुक्रिया जो आप 'ठाले बैठे' में
    मेरी रचना 'ख्यालों में' को शामिल किया है! और आप को बहुत
    बहुत मुबारक हो जो आप ने 'ठाले बैठे' के ज़रिये इतनी अच्छी रचनाओं
    का संकलन किया है! अभी तक तो आप की दी छंदों के उपर दी हुई
    जानकारी का ही कायल रहा हूँ जिस से बहुत कुछ सीखने को मिला है,
    आप की साहित्य की सेवा सराहनीय है!

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  14. नवीन जी, इस सुन्दर,सार्थक एवं सफल प्रयास के लिए बधाई स्वीकार करें !

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  15. यह आधुनिक परिवेश, इसमें, हम सभी पर भार है।
    यह भार भी भारी नहीं, जब, संस्कृति आधार है।।

    वाह! सुन्दर है!

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  16. सहना पड़े सुख दुःख कभी, मत भूलिए उस पाप को।
    यह जिन्दगी है कीमती, अब, छोडिये संताप को।।

    अभिमान को भी त्यागिये, तब, मापिये निज ताप को।
    तब तो कसौटी पर कसें हम, आज अपने आप को।३।

    Bahut sundar sir...

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  17. आदरणीय अम्बरीश भईया को पढ़ना हमेशा ही सुखद होता है.... आनंद आ गया....
    सादर आभार....

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  18. आदरणीय अम्बरीश जी को पढना अत्यंत ही सुखद अहसास होता है ..........

    यह आधुनिक परिवेश, इसमें, हम सभी पर भार है।
    यह भार भी भारी नहीं, जब, संस्कृति आधार है।।
    बहुत ही सुन्दर....

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