25 July 2011

गर है सच्चा प्यार - व्यक्त करिए जीते जी

जीते जी पूछें नहीं, चलें निगाहें फेर
आँख मूँदते ही मगरतारीफों के ढेर
तारीफों के ढेर, सुनाते अद्भुत किस्से
क्या सच है - क्या झूठ, कौन पूछे ये किस से
मृत्यु बाद सन्ताप - भला क्या सिद्ध करे जी

गर है सच्चा प्यार - व्यक्त करिए जीते जी

16 comments:

  1. आपकी इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल दिनांक 26-07-2011 को चर्चामंच http://charchamanch.blogspot.com/ पर मंगलवारीय चर्चा में भी होगी। सूचनार्थ

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  2. वाह!! क्या खूब!!

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  3. जीते जी पूछें नहीं, चलें निगाहें फेर|
    आँख मूँदते ही मगर, तारीफों के ढेर||
    बहुत अच्छी रचना ,सटीक शब्दो के साथ

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  4. अगल बगल करता रहा, जीवन भर उत्पात |
    मरा पडोसी था भला, मदद किया दिन-रात ||

    बहुत-बहुत बधाई नवीन जी ||

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  5. यथार्थ और प्रेरक ... दोनों बातें।

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  6. व्यक्त कर उद्गार मन के।

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  7. सच्चाई बयाँ की है ... इस दुनिया से जाने के बाद ही व्यक्ति की अच्छाइयां नज़र आती हैं ..

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  8. शास्वत सच्चाई को अभिव्यक्त करता कुण्डली छंद...
    सादर....

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  9. Bahut sundar . Aanandit ho gyaa hoon.

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  10. बहुत सुंदर नवीन भाई, सच्ची बात को बड़े ही शानदार तरीके से कहा है आपने। हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए।

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  11. @मृत्यु बाद संताप - भला क्या सिद्ध करे जी|


    प्रेरक

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  12. कुंडली के शब्द-संयोजन में एक नवीनता झलक रही है।
    नायाब कुंडली के लिए बधाई, नवीन जी।

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  13. नवीन जी,
    बहुत सुन्दर बात आपने कवित्त के माध्यम से व्यक्त किया है ह्रदय को स्पर्श करने वाली और एकदम सच्ची....
    बहुत पहले कॉलेज की एक पत्रिका में ऐसी ही एक बात मैंने भी लिखी थी ...
    करके हम को याद ज़माना अब क्यों रोये
    जब था तेरे पास, रहे तुम सोये-सोये
    लेकिन सच तो यह भी है कि आदमी तो सारी जिंदगी खोया रहता है अपने स्वार्थ जंजाल में..वह किसी का आंकलन तो करता ही उसकी अनुपस्थिति में है यह तो ज़माने की चाल है भैया....

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