6 August 2016

फूल जहाँ रखता है; काँटे भी रखता ही है - नवीन

फूल जहाँ रखता है; काँटे भी रखता ही है
शायद ऊपर वाला भी अपने जैसा ही है
आख़िर कब तक सच बोलें और बैर बढाएँ हम
आईनों को एक दिन शीशा बन जाना ही है
स्वाद हवा का चखते ही दिल झूम उठा साहब
माँ के हाथ के शरबत में जादू होता ही है
आप हमारी सज्जनता पे इतना मत रीझें
बाबू जी हम झरनों को गिर कर बहना ही है
हम ने मज़बूरी में भेड़ों की सुहबत की थी
वरना शेरों की आदत तो मर्दाना ही है
आज की दुनिया को अन्धेर पसन्द है क्या कीजे
धुन्ध भरे इस्कूलों का धन्धा बढना ही है
क़िस्मत पर सुहबत का साया पड़ता ही है ‘नवीन’
गेंहू की सुहबत में रह कर घुन पिसता ही है

नवीन सी चतुर्वेदी

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काव्य गुरु
प्रात: स्मरणीय परमादरणीय कविरत्न स्व. श्री यमुना प्रसाद चतुर्वेदी 'प्रीतम' जी

काव्य गुरु <br>प्रात: स्मरणीय परमादरणीय कविरत्न स्व. श्री यमुना प्रसाद चतुर्वेदी 'प्रीतम' जी
जन्म ११ मई १९३१
हरि शरण गमन १४ मार्च २००५

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