1 June 2014

कविता - सपने - सोनी किशोर सिंह



मेरी आँखों ने देखे थे हजारों सपने
लोकिन उन सपनों की नहीं थी जमीन
सब हवा में उड़ते रहते 
रातों को आकर चुपचाप
मेरी नींद में खलल डालते।
आँखें देख लेतीं एक ही रात में
कई-कई सपने
और रंगीन हो जाती आँखें।
फिर सुबह तक मिट जाता उनका वजूद
इस जन्म और मृत्यु के बीच होती
दिन की आहटरोजमर्रा का कोलाहल।
हर सपने ने 
मेरी आँखों में आकर ली थी अंतिम साँसे
उनकी मृत्यु पर नहीं गिरे थे आँसू
क्योंकि उस मौन मौत के वक्त
बंद होती थी पलकें।
रोज मन में मरे सपनों की चिता जलती।
और स्वप्नहंता का अपराधबोध छोड़,
आँखे फिर ढूँढ़ लेती
एक नया सपना।
कभी इसी उधेड़बुन में कट जाता दिन 
कि हर सपना अनाथ था
या फिर मेरी आँखों में आकर 
हो गया था अपूर्णअनाथ?



सोनी किशोर सिंह

8108110152

2 comments:

  1. शुभ प्रभात
    रोज मन में मरे सपनों की चिता जलती।
    और स्वप्नहंता का अपराधबोध छोड़,
    आँखे फिर ढूँढ़ लेती
    एक नया सपना।
    उम्दा रचना
    अद्धभूत अभिव्यक्ति

    ReplyDelete

नई पुरानी पोस्ट्स ढूँढें यहाँ पर

काव्य गुरु
प्रात: स्मरणीय परमादरणीय कविरत्न स्व. श्री यमुना प्रसाद चतुर्वेदी 'प्रीतम' जी

काव्य गुरु <br>प्रात: स्मरणीय परमादरणीय कविरत्न स्व. श्री यमुना प्रसाद चतुर्वेदी 'प्रीतम' जी
जन्म ११ मई १९३१
हरि शरण गमन १४ मार्च २००५

My Bread and Butter

यहाँ प्रकाशित सभी सामग्री के सभी अधिकार / दायित्व तत्सम्बन्धित लेखकाधीन हैं| अव्यावसायिक प्रयोग के लिए स-सन्दर्भ लेखक के नाम का उल्लेख अवश्य करें| व्यावसायिक प्रयोग के लिए पूर्व लिखित अनुमति आवश्यक है|

साहित्यम पर अधिकान्शत: छवियाँ साभार गूगल से ली जाती हैं। अच्छा-साहित्य अधिकतम व्यक्तियों तक पहुँचाने के प्रयास के अन्तर्गत विविध सामग्रियाँ पुस्तकों, अनतर्जाल या अन्य व्यक्तियों / माध्यमों से सङ्ग्रहित की जाती हैं। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री पर यदि किसी को किसी भी तरह की आपत्ति हो तो अपनी मंशा विधिवत सम्पादक तक पहुँचाने की कृपा करें। हमारा ध्येय या मन्तव्य किसी को नुकसान पहुँचाना नहीं है।