30 April 2014

उदास करते हैं सब रङ्ग इस नगर के मुझे - फ़ौज़ान अहमद

उदास करते हैं सब रङ्ग इस नगर के मुझे
ये क्या निगाह मिली उम्र से गुजर के मुझे

जो जह्न-ओ-दिल की सभी वुसअतों से बाहर है
तलाशना है उसे रूह में उतर के मुझे
 वुसअत - विस्तार, फैलाव

कहाँ ठहरना, कहाँ तेज़-गाम चलना है
थकन सिखायेगी आदाब अब सफ़र के मुझे
 तेज़-गाम - तेज़-क़दम
मैं अन्धकार के सीने को चीर सकती हूँ
ये एक किरन ने बताया बिखर-बिखर के मुझे

जो खींच कर के मुझे ले गया रसातल में
वही तो ख़्वाब दिखाता रहा शिखर के मुझे

:- फ़ौज़ान अहमद 

बहरे मुजतस मुसमन मख़बून महज़ूफ
मुफ़ाइलुन फ़इलातुन मुफ़ाइलुन फ़ेलुन
1212 1122 1212 22  

2 comments:



  1. ☆★☆★☆



    जो जह्न-ओ-दिल की सभी वुसअतों से बाहर है
    तलाशना है उसे रूह में उतर के मुझे

    वाह ! वाऽह…!


    पूरी ग़ज़ल के लिए मुबारकबाद !

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  2. क्या कहने जिंदाबाद ग़ज़ल हुई है साहब

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