28 February 2014

होली पर कुछ मन की बात - ऋता शेखर 'मधु'

होली...एक ऐसा शब्द जो श्रवण करते ही कितने सारे भाव उपज आते हैं मन की भूमि पर जो बंजर बन चुके मस्तिष्क पर भी रंगों की बौछार करने से नहीं चूकते| होली में बहार है, होली में खुमार है, होली में श्रृंगार है,होली वीणा की झंकार है, होली रंगों का त्योहार है,होली साजन की पुकार है| जो पर्व सर्वभाव संपन्न है उसके लिए मौसम भी तो खास है अर्थात ऋतुओं का राजा बसंत ही इन सबका सूत्रधार है|

पीत परिधान में सजे ऋतुराज का आगमन चारो ओर हर्ष, प्रेम और उल्लास भर देता है| पतझर की पीड़ा झेल रहे बागों में कोंपलों का आगमन है| यह वही मौसम है जब श्रीराम जनककुमारी सीता से पुष्पवाटिका में मिले थे| श्रीकृष्ण ने गोपियों संग रास रचाया था| महाशिवरात्रि में ऊँ नमः शिवाय का जयघोष है जब देवाधिदेव भगवान शिव का पार्वती से मिलन हुआ था| फाग की मस्ती भी है, वीणावादिनी का संगीत भी, भँवरों की गूँज  और कलियों का प्रस्फुटन भी है| आम की बौर से बौराया समाँ है जहाँ कोकिलों की कूक भी है|

हमारे भारत देश में सभी त्योहार मनाने के पीछे कुछ उद्देश्य अवश्य रहता है| होली नवसंवत्सर का प्रथम दिन है जो हर्ष उल्लास के साथ मनाया जाता है और इस बात का संदेश देता है कि सभी के जीवन में खुशियों का रंग भरा रहे | सबसे सार्थक परम्परा यह है कि संवत्सर का अवसान होलिका दहन से होता है जो यह बताता है कि सारी बुराइयों को पीछे छोड़ जाएँ हम, मन की कलुषता को अग्नि की भेंट चढ़ाएँ हम और स्वच्छ हृदय से चैत्र के प्रथम दिन की शुरुआत करें और सालों भर खुशियाँ बाँटें| होली मिलन की संस्कृति इसी बात की परिचायक है जो भेद भाव का नाश करती है ,मन में उपजे वैर कंटकों को समूल नाश करने का संदेश देती हे|

होली के दिन सुबह होते ही टोलियाँ निकल पड़ती हैं सड़कों, गली मुहल्लों में और साथ होती हैं रंग भरी पिचकारियाँ| किसी ने कितने भी झक सफ़ेद कपड़े पहने हों इससे कोई मतलब नहीं| भइ, होली है तो रंगीन ही होना होगा, उजले की गुँजाइश नहीं | गुस्सा करने का भी अधिकार नहीं क्योंकि हाली का तो बस अपना ही नारा है','बुरा न मानो होली है'| भाभियों की तो खेर नहीं, रंग डालो उन्हें अपने घर की रीति रिवाजों में और जीजा साली की होली में बेचारी दीदियाँ भी कुछ नहीं कर पाती| दिन भर की हुड़दंग के बीच घर के बुज़ुर्गों की पुकार भी तो शामिल है, अरे भाई कुछ खा-पी लो, हमें भी खिलाओ या सिर्फ रंग ही खेलोगे|

दोपहर तक शांत हो गई सड़कें| घर के अंदर स्नान और रंग छुड़ाने की प्रक्रिया शुरु हुई| मगर भाभी जी, आप तो कुछ देर बाद ही नहाएँ क्योंकि बाथरुम के बाहर देवर-ननदों की जमात खड़ी है रंगों की बाल्टियाँ लेकर| आप फिर से रंगी जाएँगी| वर्ष में एक बार आने वाला यह त्योहार रिश्तों में कितनी मिठास भर देता है यह महसूस करने की बात है|

नहाने के बाद खाना खाकर सभी चले झपकियाँ लेने, फिर तैयार भी तो होना है मेहमानों की आवभगत के लिए| तश्तरियों में पकवान और मेवे सजाए गए| अबीर गुलाल के पैकेट रखे गए| कोई कमी न रह जाए, पुए और दही बड़े भी सज गए| सांध्य काल की दस्तक के साथ ही शुरु हुई बड़ों के चरण पर अबीर रखकर प्रणाम करने की प्रक्रिया| बडों ने जी भर कर आशीर्वाद दिया और साथ में परवी भी मिली| देर रात तक मेहमानों के आने का सिलसिला जारी रहता हे|

होली में सभी अपने घर आने की कोशिश करते हैं, तभी तो हमारा भारत परिवार को एकजुट रखने में कामयाब रहता है| हर्ष के पर्व को गलत मानसिकता से कभी न मनाएँ| व्यवहार में शिष्टता बेहद जरूरी है| होली के नाम पर बेहुदे मजाक वातावरण को बोझिल बना देते हैं | इससे सदा बचना चाहिए क्योंकि यह आपके व्यक्तित्व को धूमिल कर सकता है|

आप सभी जीवन में हमेशा रंगो की छिटकन बनी रहे| शुभकामनाएँ सभी को|

4 comments:

  1. रंगों की नायाब प्रस्तुति

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  2. आभार नवीन जी एवं रश्मि दी !!

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  3. ऋता जी !! बहुत सजीव चित्र है होली का आपके आलेख में !! धार्मिक , सामाजिक और व्याव्हारिक प्रास्ंगिकता !! भूमिका तो एक खूब्सूरत गद्य गीत है !! जानकारी भी हासिल हुई और आपके कलम के काइल भी हुये !! ऐसे आलेख और भी लिखिये – मयंक

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    1. प्रोत्साहन एवं प्रेरणा हेतु बहुत आभार मयंक जी !!

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