28 February 2014

होली के छन्द - कहाँ गईं वे मस्तियाँ, कहाँ गई वह मौज़ - नवीन

कहाँ गईं वे मस्तियाँ, कहाँ गई वह मौज़
वे केशर की क्यारियाँ, गोबर वाले हौज़
गोबर वाले हौज़ बीच डुबकी लगवाना
कुर्ते पर पागल वाली तख़्ती लटकाना
याद आ रहा है हम जो करते थे अक्सर
बीच सड़क पर एक रुपैया कील ठोंक कर

होता ही है हर बरस अपना तो ये हाल
जैसे ही फागुन लगे, दिल की बदले चाल
दिल की बदले चाल, हाल कुछ यूँ होता है
लगता है दुनिया मैना अरु दिल तोता है
फागुन में तो भैया ऐसो रंग चढ़े है
भङ्ग पिये बिन भी दुनिया ख़ुश-रङ्ग लगे है

होली के त्यौहार की, बड़ी अनोखी रीत
मुँह काला करते हुये जतलाते हैं प्रीत
जतलाते हैं प्रीत, रंगदारी करते हैं
सात पुश्त की ऐसी की तैसी करते हैं
करते हैं सत्कार गालियों को गा-गा कर
लेकिन सुनने वाले को भी हँसा-हँसा कर

जीजा-साली या कि फिर देवर-भाभी सङ्ग
होली के त्यौहार में, खिलते ही हैं रङ्ग
खिलते ही हैं रङ्ग, अङ्ग-प्रत्यङ्ग भिगो कर
ताई जी हँसती हैं फूफाजी को धो कर
लेकिन तब से अब में इतना अन्तर आया
पहले मन रँगते थे अब रँगते हैं काया

सब के दिल ग़मगीन हैं, बेकल सब संसार
मुमकिन हो तो इस बरस, कुछ ऐसा हो यार
कुछ ऐसा हो यार, प्यार की बगिया महकें
जिन की डाली-डाली पर दिलवाले चहकें
ऐसी अब के साल, साल भर होली खेलें
ख़ुशियों को दुलराएँ, ग़मों को पीछे ठेलें

3 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति है | सादर बधाई

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  2. पढकर अपने गांव की होली याद आ गयी दादा बहुत खूब

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