19 November 2013

कमल, गुलाब, जुही, गुलमुहर बचात भए - नवीन

कमल, गुलाब, जुही, गुलमुहर बचात भए
महक रयौ ऊँ महकते नगर बचात भए

सरद की रात में चन्दा के घर चली पूनम
अधर, अधर पे धरैगी अधर बचात भए

सरल समझियो न बा कूँ घनी चपल है बौ
नजर में सब कूँ रखतु ऐ नजर बचात भए

तू अपने आप कूँ इतनौ समझ न खबसूरत
बौ मेरे संग हू नाची, मगर बचात भए

जे खण्डहर नहीं जे तौ धनी एँ महलन के
बिखर रए एँ जो बच्चन के घर बचात भए

जो छंद-बंध सूँ डरत्वें बे देख लेंइ खुदइ
मैं कह रहयौ हूँ गजल कूँ बहर बचात भए

चमन कूँ देख कें मालिन के म्हों सूँ यों निकस्यौ
कटैगी सगरी उमरिया सजर बचात भए


[भाषा धर्म के अधिकतम निकट रहते हुये भावार्थ-गजल]


कमलगुलाबजुहीगुलमुहर बचाते हुये
महक रहा हूँ महकते नगर बचाते हुये

शरद की रात में चन्दा के घर चली पूनम
अधरअधर पे धरेगी अधर बचाते हुये

सरल समझना न उस को बहुत चपल है वह
नज़र में रखती है सबको नज़र बचाते हुये

तू अपने आप को इतना भी ख़ूब-रू न समझ
वो मेरे साथ भी नाचीमगर बचाते हुये

ये खण्डहर नहीं ये तो धनी हैं महलों के
बिखर रहे हैं जो बच्चों के घर बचाते हुये

जो छंद-बंध से डटे हैं ख़ुद ही देख लें वो
मैं कह रहा हूँ ग़ज़ल को बहर बचाते हुये

चमन को देखा तो बरबस ही बोल उठे माली

तमाम उम्र कटेगी शजर बचाते हुये



:- नवीन सी. चतुर्वेदी

बहरे मुजतस मुसमन मख़बून महज़ूफ
मुफ़ाइलुन फ़इलातुन मुफ़ाइलुन फ़ेलुन

1212 1122 1212 22  

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