4 June 2013

दोहा गाथा - आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'

अच्छा लगता है जब कोई हम पर अधिकार जताते हुये शिकायत करता है। विगत दिनों आ. सलिल जी, सौरभ पाण्डेय जी, राजेन्द्र स्वर्णकार जी, मयंक अवस्थी जी, धर्मेन्द्र कुमार सज्जन जी तथा अरुण निगम जी सहित तमाम  सहकर्मियों ने शिकायत दर्ज़ की कि ठाले-बैठे पर छंद-साधना की गति कुछ मंथर हुई है। हमने भी अपना पक्ष रख दिया कि भाई ब्लॉग पर की साहित्य सेवा तो अकेले हाथ चल जाती है मगर आयोजन अकेले हाथ नहीं चल सकता। सभी समझदार हैं, इशारा समझ गए। तो समस्या पूर्ति के अगले आयोजन की घोषणा के पूर्व बतौर वार्म-अप आ. सलिल जी का एक आलेख पढ़ते हैं। आप सभी से सविनय निवेदन है कि अगली पोस्ट में आयोजन विषयक चर्चा में अपने सुझाव अवश्य प्रस्तुत करें।  
बहुरूपी दोहा अमर 
संजीव 
                                                                                *
बहुरूपी दोहा अमर, सिन्धु बिंदु में लीन.
सागर गागर में भरे, बांचे कथा प्रवीण.

दोहा मात्रिक छंद है, तेईस विविध प्रकार.
तेरह-ग्यारह दोपदी, चरण समाहित चार.

विषम चरण के अंत में, 'सनर' सुशोभित खूब.
सम चरणान्त 'जतन' रहे, पाठक जाये डूब.

विषम चरण के आदि में, 'जगण' विवर्जित मीत.
दो शब्दों में मान्य है, यह दोहा की रीत.

छप्पय रोला सोरठा, कुंडलिनी चौपाइ.
उल्लाला हरिगीतिका, दोहा के कुनबाइ.

सुख-दुःख दो पद रात-दिन, चरण चतुर्युग चार.
तेरह-ग्यारह विषम-सम, दोहा विधि अनुसार.

द्रोह, मोह, आक्रोश या, योग, भोग, संयोग.
दोहा वह उपचार जो, हरता हर मन-रोग.

दोहा के २३ प्रकार लघु-गुरु मात्राओं के संयोजन पर निर्भर हैं। सम चरण में ११-११, विषम चरण में १३-१३ तथा दो पदों में २४-२४ मात्राओं के बंधन को मानते हुए २३ प्रकार के दोहे होना पिंगालाचार्यों की अद्‍भुत कल्पना शक्ति तथा गणितीय मेधा का जीवंत प्रमाण है। विश्व की किसी अन्य भाषा के पास ऐसी सम्पदा नहीं है। 

छंद गगन के सूर्य  दोहा की रचना के मानक समय-समय पर बदलते गए, भाषा का रूप, शब्द-भंडार, शब्द-ध्वनियाँ जुड़ते-घटते रहने के बाद भी दोहा प्रासंगिक रहा उसी तरह जैसे पाकशाला में पानी। दोहा की सरलता-तरलता ही उसकी प्राणशक्ति है। दोहा की संजीवनी पाकर अन्य छंद भी प्राणवंत हो जाते हैं। इसलिये दोहा का उपयोग अन्य छंदों के बीच में रस परिवर्तन, भाव परिवर्तन या प्रसंग परिवर्तन के लिए किया जाता रहा है। निम्न सारणी देखिये-
क्रमांक   नाम   गुरु   लघु   कुल कलाएं   कुल मात्राएँ 
- -                      २४     ०           २४              ४८
- -                      २३      २          २५              ४८
१.         भ्रामर   २२      ४           २६              ४८
२.      सुभ्रामर   २१      ६          २७               ४८
३.       शरभ      २०      ८          २८               ४८
४.       श्येन      १९     १०          २९               ४८
५.       मंडूक     १८    १२          ३०               ४८
६.       मर्कट     १७    १४          ३१                ४८
७.      करभ
     १६     १६          ३२               ४८
८.
        नर       १५     १८         ३३               ४८
९.
        हंस       १४     २०         ३४               ४८
१०.
     गयंद     १३      २२        ३५               ४८
११.
    पयोधर   १२     २४        ३६               ४८
१२.       बल       ११     २६         ३७               ४८
१३.      पान       १०     २८        ३८               ४८
१४.     त्रिकल      ९     ३०        ३९               ४८
१५.    कच्छप     ८     ३२        ४०               ४८
१६.      मच्छ       ७    ३४        ४१               ४८
१७.     शार्दूल      ६     ३६        ४२               ४८
१८.     अहिवर    ५    ३८        ४३               ४८
१९.     व्याल       ४     ४०       ४४               ४८
२०.    विडाल      ३     ४२       ४५              ४८
२१.     श्वान        २     ४४        ४६              ४८
२२.      उदर       १      ४६       ४७              ४८
२३.      सर्प        ०      ४८       ४८              ४८

इस लम्बी सूची को देखकर घबराइये मत। यह देखिये कि आचार्यों ने किसी गणितज्ञ की तरह समस्त संभावनायें तलाश कर दोहे के २३ प्रकार बताये। दोहे के दो पदों में २४ गुरु होने पर लघु के लिए स्थान ही नहीं बचता। सम चरणों के अंत में लघु हुए बिना दोहा नहीं कहा जा सकता।
२३ गुरु होने पर हर पद में केवल एक लघु होगा जो सम चरण में रहेगा। तब विषम चरण में लघु मात्र न होने से दोहा कहना संभव न होगा। आपने जो दोहे कहे हैं या जो दोहे आपको याद हैं वे इनमें से किस प्रकार के हैं, रूचि हो तो देख सकते हैं। क्या आप इन २३ प्रकारों के दोहे कह सकते हैं? कोशिश करें...कठिन लगे तो न करें...मन की मौज में दोहे कहते जाएँ...धीरे-धीरे अपने आप ही ये दोहे आपको माध्यम बनाकर बिना बताये, बिना पूछे आपकी कलम से उतर आयेंगे।

साखी से सिख्खी हुआ...

कबीर ने दोहा को शिक्षा देने का अचूक अस्त्र बना लिया। शिक्षा सम्बन्धी दोहे साखी कहलाये। गुरु नानकदेव ने दोहे को अपने रंग में रंग कर माया में भरमाई दुनिया को मायापति से मिलाने का साधन बना दिया। साखी से सिख्खी हुए दोहे की छटा देखिये-
पहले मरण कुबूल कर, जीवन दी छंड आस.
हो सबनां दी रेनकां, आओ हमरे पास..
सोचै सोच न होवई, जे सोची लखवार.
चुप्पै चुप्प न होवई, जे लाई लिवतार..
इक दू जीभौ लख होहि, लाख होवहि लख वीस.
लखु लखु गेडा आखिअहि, एकु नामु जगदीस..
दोहा की छवियाँ अमित

दोहा की छवियाँ अमित, सभी एक से एक.
निरख-परख रचिए इन्हें, दोहद सहित विवेक..

दोहा के तेईस हैं, ललित-ललाम प्रकार.
व्यक्त कर सकें भाव हर, कवि विधि के अनुसार..

भ्रमर-सुभ्रामर में रहें, गुरु बाइस-इक्कीस.
शरभ-श्येन में गुरु रहें, बीस और उन्नीस..

रखें चार-छ: लघु सदा, भ्रमर सुभ्रामर छाँट.
आठ और दस लघु सहित, शरभ-श्येन के ठाठ..


भ्रमर- २२ गुरु, ४ लघु=४८

बाइस गुरु, लघु चार ले, रचिए दोहा मीत.
भ्रमर सद्रश गुनगुन करे, बना प्रीत की रीत.

सांसें सांसों में समा, दो हो पूरा काज,
मेरी ही तो हो सखे, क्यों आती है लाज?


सुभ्रामर - २१ गुरु, ६ लघु=४८

इक्किस गुरु छ: लघु सहित, दोहा ले मन मोह.
कहें सुभ्रामर कवि इसे, सह ना सकें विछोह..

पाना-खोना दें भुला, देख रहा अज्ञेय.
हा-हा,ही-ही ही नहीं, है सांसों का ध्येय..


शरभ- २० गुरु, ८ लघु=४८

रहे बीस गुरु आठ लघु का उत्तम संयोग.
कहलाता दोहा शरभ, हरता है भव-रोग..

हँसे अंगिका-बज्जिका, बुन्देली के साथ.
मिले मराठी-मालवी, उर्दू दोहा-हाथ..


श्येन- १९ गुरु, १० लघु=४८

उन्निस गुरु दस लघु रहें, श्येन मिले शुभ नाम.
कभी भोर का गीत हो, कभी भजन की शाम..

ठोंका-पीटा-बजाया, साधा सधा न वाद्य.
बिना चबाये खा लिया, नहीं पचेगा खाद्य..


दोहा के २३ प्रकारों में से चार से परिचय प्राप्त करें और उन्हें मित्र बनाने का प्रयास करें.
 
दोहा के आकर्षण से भारतेंदु हरिश्चन्द्र के अंग्रेज मित्र स्व. श्री फ्रेडरिक पिंकोट नहीं बच सके। श्री पिंकोट का निम्न सोरठा एवं दोहा यह भी तो कहता है कि जब एक विदेशी और हिन्दी न जाननेवाला इन छंदों को अपना सकता है तो हम भारतीय इन्हें सिद्ध क्यों नहीं कर सकते? प्रश्न इच्छाशक्ति का है, छंद तो सभी को गले लगाने के लिए उत्सुक है।  

बैस वंस अवतंस, श्री बाबू हरिचंद जू.
छीर-नीर कलहंस, टुक उत्तर लिख दे मोहि.

शब्दार्थ: बैस=वैश्य, वंस= वंश, अवतंस=अवतंश, जू=जी, छीर=क्षीर=दूध, नीर=पानी, कलहंस=राजहंस, तुक=तनिक, मोहि=मुझे.

भावार्थ: हे वैश्य कुल में अवतरित बाबू हरिश्चंद्र जी! आप राजहंस की तरह दूध-पानी के मिश्रण में से दूध को अलग कर पीने में समर्थ हैं. मुझे उत्तर देने की कृपा कीजिये.

श्रीयुत सकल कविंद, कुलनुत बाबू हरिचंद.
भारत हृदय सतार नभ, उदय रहो जनु चंद.


भावार्थ: हे सभी कवियों में सर्वाधिक श्री संपन्न, कवियों के कुल भूषण! आप भारत के हृदयरूपी आकाश में चंद्रमा की तरह उदित हुए हैं.

सुविख्यात सूफी संत अमीर खुसरो (संवत १३१२-१३८२) ने दोहा का दामन थामा तो दोहा ने उनकी प्यास मिटाने के साथ-साथ उन्हें जन-मन में प्रतिष्ठित कर अमर कर दिया-

गोरी सोयी सेज पर, मुख पर डारे केस.
चल खुसरो घर आपने, रैन भई चहुँ देस..

खुसरो रैन सुहाग की, जागी पी के संग.
तन मेरो मन पीउ को, दोउ भये इक रंग..

सजन सकारे जायेंगे, नैन मरेंगे रोय.
विधना ऐसी रैन कर, भोर कभी ना होय..


गोष्ठी के समापन से पूर्व एक रोचक प्रसंग

एक बार सद्‍गुरु रामानंद के शिष्य कबीरदास सत्संग की चाह में अपने ज्येष्ठ गुरुभाई रैदास के पास पहुँचे। रैदास अपनी कुटिया के बाहर पेड़ की छाँह में चमड़ा पका रहे थे। उन्होंने कबीर के लिए निकट ही पीढ़ा बिछा दिया और चमड़ा पकाने का कार्य करते-करते बातचीत प्रारंभ कर दी। कुछ देर बाद कबीर को प्यास लगी। उन्होंने रैदास से पानी माँगा। रैदास उठकर जाते तो चमड़ा खराब हो जाता, न जाते तो कबीर प्यासे रह जाते... उन्होंने आव देखा न ताव समीप रखा लोटा उठाया और चमड़ा पकाने की हंडी में भरे पानी में डुबाया, भरा और पीने के लिए कबीर को दे दिया। कबीर यह देखकर भौंचक्के रह गये किन्तु रैदास के प्रति आदर और संकोच के कारण कुछ कह नहीं सके। उन्हें चमड़े का पानी पीने में हिचक हुई, न पीते तो रैदास के नाराज होने का भय... कबीर ने हाथों की अंजुरी बनाकर होठों के नीचे न लगाकर ठुड्डी के नीचे लगाली तथा पानी को मुँह में न जाने दिया। पानी अंगरखे की बाँह में समा गया, बाँह लाल हो गयी। कुछ देर बाद रैदास से बिदा लकर  कबीर घर वापिस लौट गये और अंगरखा उतारकर अपनी पत्नी लोई को दे दिया। लोई भोजन पकाने में व्यस्त थी, उसने अपनी पुत्री कमाली को वह अंगरखा धोने के लिए कहा। अंगरखा धोते समय कमाली ने देखा उसकी बाँह  लाल थी... उसने देख कि लाल रंग छूट नहीं रहा है तो उसने मुँह से चूस-चूस कर सारा लाल रंग निकाल दिया... इससे उसका गला लाल हो गया। तत्पश्चात कमाली मायके से बिदा होकर अपनी ससुराल चली गयी।

कुछ दिनों के बाद गुरु रामानंद तथा कबीर का काबुल-पेशावर जाने का कार्यक्रम बना। दोनों परा विद्या (उड़ने की कला) में निष्णात थे। मार्ग में कबीर-पुत्री कमाली की ससुराल थी। कबीर के अनुरोध पर गुरु ने कमाली के घर रुकने की सहमति दे दी। वे अचानक कमाली के घर पहुँचे तो उन्हें घर के आँगन में दो खाटों पर स्वच्छ गद्दे-तकिये तथा दो बाजोट-गद्दी लगे मिले। समीप ही हाथ-मुँह धोने के लिए बाल्टी में ताज़ा-ठंडा पानी रखा था। यही नहीं उन्होंने कमाली को हाथ में लोटा लिये हाथ-मुँह धुलाने के लिए तत्पर पाया। कबीर यह देखकर अचंभित रह गये ककि  हाथ-मुँह धुलाने के तुंरत बाद कमाली गरमागरम खाना परोसकर ले आयी।

भोजन कर गुरु आराम फरमाने लगे तो मौका देखकर कबीर ने कमाली से पूछा कि उसे कैसे पता चला कि वे दोनों आने वाले हैं? वह बिना किसी सूचना के उनके स्वागत के लिए तैयार कैसे थी? कमाली ने बताया कि रंगा लगा कुरता चूस-चूसकर साफ़ करने के बाद अब उसे भावी घटनाओं का आभास हो जाता है। तब कबीर समझ सके कि उस दिन गुरुभाई रैदास उन्हें कितनी बड़ी सिद्धि बिना बताये दे रहे थे तथा वे नादानी में वंचित रह गये।

कमाली के घर से वापिस लौटने के कुछ दिन बाद कबीर पुनः रैदास के पास गये... प्यास लगी तो पानी माँगा... इस बार रैदास ने कुटिया में जाकर स्वच्छ लोटे में पानी लाकर दिया तो कबीर बोल पड़े कि पानी तो यहाँ कुण्डी में ही भरा था, वही दे देते। तब रैदास ने एक दोहा कहा-

जब पाया पीया नहीं, था मन में अभिमान.
अब पछताए होत क्या नीर गया मुल्तान.


कबीर ने इस घटना अब सबक सीखकर अपने अहम् को तिलांजलि दे दी तथा मन में अन्तर्निहित प्रेम-कस्तूरी की गंध पाकर ढाई आखर की दुनिया में मस्त हो गये और दोहा को साखी का रूप देकर भव-मुक्ति की राह बताई -

कस्तूरी कुंडल बसै, मृग ढूंढें बन माँहि .
ऐसे घट-घट राम है, दुनिया देखे नाँहि.


आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'

16 comments:

  1. वाह आदरणीय वाह अत्यंत सुन्दरता से प्रस्तुतीकरण, आचार्य सलिल सर जी दोहा छंद की महिमा का सुन्दरता से गुणगान किया है साथ ही विशेषता से भी रूबरू करवाया है, आपकी यह पोस्ट हृदयस्पर्शी के साथ साथ शिक्षाप्रद एवं दोहा विधान को सीखने की इच्छा रखने वालों के लिए अत्यंत लाभकारी है. आनंद आ गया. जय हो

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  2. आज ०४/०६/२०१३ को आपकी यह पोस्ट ब्लॉग बुलेटिन - काला दिवस पर लिंक की गयी हैं | आपके सुझावों का स्वागत है | धन्यवाद!

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  3. बहुत अच्छी जानकारी ...अब तक इतना विस्तार से पता नहीं था...

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  4. बहुत विस्तृत एवं मजेदार आलेख। धन्यवाद इसे पढ़वाने के लिए।

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  5. --अच्छा दोहा पाठ...

    मेरे विचार में -----वे गुरु गोरखनाथ थे जिनको रैदास ने पानी पीने हेतु दिया था| यह कथा इस प्रकार है कि कबीर व गोरखनाथ रैदास के यहाँ आये साथ में कबीर की बेटी कमाली भी थी | रैदास जी अपने नित्य कर्म अनुसार जूते सी रहे थे उसी चमड़े डुबोने वाले कठौता से पानी से भरकर गोरखनाथ को देदिया जो उन्होंने नहीं पीया | तो उसे बेटी कमाली को पिला दिया | काफी समय बाद एक रोज गोरख आकाश मार्ग से जा रहे थे ! नीचे से उन्हे एक महिला की आवाज आई-
    प्रणाम गुरूजी .....गुरु गोरख नाथ चौंके ? यह कौन है जो मुझे इस तरह देख पा रहा है ! और वो भी एक औरत ? उन्हे बडा आश्चर्य हुवा ! गुरु गोरखनाथ महान सिद्ध थे अपनी मर्जी से आकाश मे अदृश्य होकर विचरते थे !
    गोरख नीचे आये और उन्होने उस औरत से पुछा कि - तुमने मुझे देखा कैसे ? वो औरत बोली - गुरुजी मैं तो आपको जब भी आप इधर से गुजरते हैं तब हमेशा ही देखती हूं और हमेशा आपको प्रणाम करती हुं ! पर आप बहुत तेजी से जा रहे होते हैं आज आप कम ऊंचाई पर थे तो आपको मेरी प्रणाम सुनाई दे गई आप तो मेरे घर चलिये और मेरा आतिथ्य गृहण कीजिये |
    परिचय पूछने पर उसने बताया कि मैं कमाली हूँ ,कबीर की बेटी | मैं भी आपके साथ रैदास जी के यहां गई थी आपने जो पानी नहीं पिया था वो रैदास जी ने मुझे दे दिया था तभी से मुझे सब अदृष्य चीजे दिखाई देती हैं ! मैं शादी के बाद यहां मुल्तान आ गई !
    गोरख तुरन्त रैदास जी के यहां गये और कठौती में से पानी पीना प्रारम्भ कर दिया तो रैदास ने कहा..

    दिया था तब पिया नहीं जो पिया, पिया को जान गया ,
    गोरख अब क्या भर भर पीवे, वो पानी मुलतान गया |

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    1. मेरे विचार में आपकि कथा का कोई आधार नही है.

      गुरु गोरक्षनाथजीकि और संत रविदासजीकि कभी भेट हुई है ऐसा संदर्भ किधरभी नही है.

      बात करे गोरक्षनाथजीकि तों
      भगवान शिव ने कहा है मैही गोरक्षनाथ हूं ( संदर्भ - गोरक्षरहस्यहम - शिवपार्वती संवाद )

      भगवान शिवही गुरु गोरक्षनाथ स्वरूप में जनसामान्य लोंगों मे भक्ति के प्रचार हेतु नाथसंप्रदाय में गोरक्षनाथ बनके आये.

      अगर गुरु गोरक्षनाथजी जातीभेद करते तो जनसामान्योंके लिये सबसे सहज शाबर मंत्रोंकि रचना नही करते.

      अगर आप गौर से गुरु गोरक्षनाथजी के चरित्र का अध्ययन करेंगे तो ये बात आपको समझ मेआयेगी कि गुरु गोरक्षनाथजी ने सभी वर्णों मे अपने शिष्य बनाये बल्कि दुसरे धर्मोंके भक्तोंपेभी क्रिपा की है.

      अगर बात करें सिद्धि की जो ईस कहानीमें बतायी हैं तो ऐसी कौनसी सिद्धि है जो भगवान शिव के पास नही है.

      जगत कि सभी शक्तियां , सिद्धियां भगवान शिवसेही उत्पन्न है.

      यह सब कबीरपंथीयों का गलत प्रचार है जो अपने तरिके से भगवदगीता का भी अर्थ निकालते है.

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    2. मेरे विचार में आपकि कथा का कोई आधार नही है.

      गुरु गोरक्षनाथजीकि और संत रविदासजीकि कभी भेट हुई है ऐसा संदर्भ किधरभी नही है.

      बात करे गोरक्षनाथजीकि तों
      भगवान शिव ने कहा है मैही गोरक्षनाथ हूं ( संदर्भ - गोरक्षरहस्यहम - शिवपार्वती संवाद )

      भगवान शिवही गुरु गोरक्षनाथ स्वरूप में जनसामान्य लोंगों मे भक्ति के प्रचार हेतु नाथसंप्रदाय में गोरक्षनाथ बनके आये.

      अगर गुरु गोरक्षनाथजी जातीभेद करते तो जनसामान्योंके लिये सबसे सहज शाबर मंत्रोंकि रचना नही करते.

      अगर आप गौर से गुरु गोरक्षनाथजी के चरित्र का अध्ययन करेंगे तो ये बात आपको समझ मेआयेगी कि गुरु गोरक्षनाथजी ने सभी वर्णों मे अपने शिष्य बनाये बल्कि दुसरे धर्मोंके भक्तोंपेभी क्रिपा की है.

      अगर बात करें सिद्धि की जो ईस कहानीमें बतायी हैं तो ऐसी कौनसी सिद्धि है जो भगवान शिव के पास नही है.

      जगत कि सभी शक्तियां , सिद्धियां भगवान शिवसेही उत्पन्न है.

      यह सब कबीरपंथीयों का गलत प्रचार है जो अपने तरिके से भगवदगीता का भी अर्थ निकालते है.

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  6. बहुत उपयोगी आलेख मान्यवर!
    विषम चरण के आदि में, 'जगण' विवर्जित मीत!
    कृपया पहला दोहा देखिए!
    जगण का प्योग तो पहले चरण में है ही।

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  7. बहुत उपयोगी आलेख ...आभार

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  8. दोहा,सीखने की अच्छी जानकारी देती,अत्यंत उपयोगी पोस्ट,आभार,,,

    recent post : ऐसी गजल गाता नही,

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  9. दोहे के बारे में सटीक जानकारी देती सुन्दर प्रस्तुति
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  10. सबके सब निष्णात हैं, सबके सब उन्मत्त
    ’अक्षर’ के सब आग्रही, अद्भुत ईश प्रदत्त

    शुभम्

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  11. विस्तृत चर्चा आचार्यत्व के अनुरूप ही रही,और कथा के दोनों ही रूप एक ही तथ्य का प्रतिपादन कर रहे हैं - संदेहशील मन बहुत-कुछ पाने से वंचित रह जाता है !

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  12. बहुत ज्ञानप्रद....

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