20 September 2013

सब की सुनता हूँ बस अपनी ही सदा काटूँ हूँ - नवीन

सब की सुनता हूँ बस अपनी ही सदा काटूँ हूँ
तुझको हमराज़ बनाने की सज़ा काटूँ हूँ
सदा-आवाज़, हमराज़ – वह व्यक्ति जिसे अपना राज़ मालूम हो

दर्द ने ही तो दिये हैं मुझे तुम जैसे हबीब
और आमद के लिए ग़म का सिरा काटूँ हूँ
हबीब – दोस्त, आमद – आवक / बढ़ोतरी

है ख़लिश इतनी अभी उड़ के पहुँचना है वहाँ
बस इसी धुन में शबरोज़ हवा काटूँ हूँ
ख़लिश – तड़प, शबोरोज़ – रात दिन

ये ज़मीं तेरी है ये मेरी ये उन लोगों की
ऐसा लगता है कि जैसे मैं ख़ला काटूँ हूँ
ख़ला – अन्तरिक्ष,ब्रह्माण्ड के सन्दर्भ में

एक भी ज़ख्म छुपाया न गया तुम से ‘नवीन’
हार कर अपने कलेज़े की रिदा काटूँ हूँ
रिदा – चादर

:- नवीन सी. चतुर्वेदी

फाएलातुन फ़एलातुन फ़एलातुन फालुन.
बहरे रमल मुसम्मन मखबून मुसक्कन.

2122 1122 1122 22

1 comment:

  1. पड़ बहर के चक्कर में हुज़ूर
    गज़ल के नाजो-अदा काटूं हूँ |

    ReplyDelete