27 July 2013

नफ़रत बढ़ा रहे हैं मुसलसल रिवाज़-ओ-रस्म - नवीन

आधी उड़ान छोड़ के जो लौट आये थे
जन्नत के ख़्वाब हम को उन्हीं ने दिखाये थे

अम्नोसुक़ून शह्र की तक़दीर में कहाँ
इस ही जगह परिन्द कभी छटपटाये थे

कुछ देर ही निगाह मिलाते हैं लोग-बाग
दो चार बार हमने भी आँसू बहाये थे

नफ़रत बढ़ा रहे हैं मुसलसल रिवाज़-ओ-रस्म
बेकार हमने रेत में दरिया बहाये थे

हीरे-जवाहरात की महफ़िल का हो गुमान
चुन-चुन के लफ़्ज़ उस ने यूँ मिसरे सजाये थे

किरदार भी बनाती है ज़िल्लत कभी-कभी
तुलसी व कालिदास इसी ने बनाये थे

:- नवीन सी. चतुर्वेदी

बहरे मुजारे मुसमन अखरब मकफूफ़ महजूफ
मफ़ऊलु फाएलातु मुफ़ाईलु फाएलुन.

221 2121 1221 212.

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