1 June 2013

चलो कि अपनी मुहब्बत सभी को बाँट आएँ - जाँनिसार अख़्तर

उफुक़ अगरचे पिघलता दिखाई पड़ता है
मुझे तो दूर सवेरा दिखाई पड़ता है
उफुक़ – क्षितिज, अगरचे – हालाँकि


हमारे शह्र में बे-चहरा लोग बसते हैं
कभी-कभी कोई चहरा दिखाई पड़ता है

चलो कि अपनी मुहब्बत सभी को बाँट आएँ
हर एक प्यार का भूखा दिखाई पड़ता है

जो अपनी ज़ात से एक अंजुमन कहा जाये
वो शख़्स तक मुझे तनहा दिखाई पड़ता है
ज़ात – व्यक्तित्व, अंजुमन – सभा


न कोई ख़्वाब न कोई ख़लिश न कोई ख़ुमार
ये आदमी तो अधूरा दिखाई पड़ता है
ख़लिश – दर्द या टीस का भाव, ख़ुमार – नशे के उतार की अवस्था


लचक रही हैं शुआओं की सीढ़ियाँ पैहम
फ़लक से कोई उतरता दिखाई पड़ता है
शुआअ – रश्मि / किरण / आलोक, पैहम – लगातार, फ़लक - आकाश


चमकती रेत पे ये गुस्ल-ए-आफ़ताब तेरा
बदन तमाम सुनहरा दिखाई पड़ता है
गुस्ल – स्नान, आफ़ताब – सूर्य, गुस्ल-ए-आफ़ताब - sunbath


:- जाँनिसार अख़्तर

बहरे मुजतस मुसमन मखबून महजूफ
मुफ़ाएलुन फ़एलातुन मुफ़ाएलुन फालुन
1212 1122 1212 22

1 comment:

  1. आपने लिखा....
    हमने पढ़ा....
    और लोग भी पढ़ें;
    इसलिए बुधवार 05/06/2013 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in
    पर लिंक की जाएगी.
    आप भी देख लीजिएगा एक नज़र ....
    लिंक में आपका स्वागत है .
    धन्यवाद!

    ReplyDelete