7 January 2013

सूरज मेरा दुश्मन [संगीता सहजवाणी] - समीक्षा देवी नागरानी

संगीता सहजवाणी



   आस्थाओं  की व्यापकता व अनुभवों की गहराई से उजला "सूरज मेरा दुश्मन"

       हिंदी साहित्य के आकाश में एक और नया सितारा रौशन नज़र आ रहा है,  जो अपना परिचय अपनी सहजता से अपनी कविताओं में दे रहा है.  जी हां यह है संगीता सहजवाणी जो एक नये सूरज से हमें रौ ब रू करा रही है जो मानवता का दुशमन है. अपने प्ररिवेश की परिधि में संगीता ने जितनी सरलता से दोस्ती का दावा किया है,  उतनी ही सहजता से निभाया भी है.  पर इस दोस्ती के दाइरे में उन्वान ''सूरज मेरा दुश्मन''  इस इन्द्र धनुषी आकाश पर कुछ और ही रंग बिखेर रहा है . अपने अस्तित्व की अभिव्यक्ति को जानना और जानकर कम से कम शब्दों में परिभाषित करना,  अपने आप में  एक अनुभूति है. कविता, सच में  देखा जाये तो  संवेदनशील हृदय की पारदर्शी अभिव्यक्ति है और शब्द उसी कविता के सर्वश्रेष्ठ प्रतिनिधिः जिनका आधार लेकर संगीता जी की निशब्द सोच शब्दों के सहारे अपने कवि हृदय से झर झर कर बहती हुई काव्य धारा में हमें बहा लेने में परिपूर्ण है. उनकी अभिव्यक्ति की शिद्दत को उनके ही शब्दों में  सुनिये-


‘‘मै तब तक नहीं लिख पाती जब तक  लिखना विवशता न बन जाय''

            अब अपनी विवशता को हमारी विवशता बनाकर उन्होंने अद्भुत अनुभूतियों से हमारा परिचय करवाया है जहां हम आस्थाओं  की व्यापकता व अनुभवों की गहराई में एक ठहराव पा लेते हैं. जिया गया आदर्श, काव्य सौंदर्य तथा कथ्य और शिल्प का अद्भुत तालमेल पाठक की उत्कंठा को जगाये रखने के लिए बहुत हैं और संगीता जी ने अपने शब्दों के जाल से समाँ बांधते हुए अपने अनुभवों के हमें परीचित करवाते हुए लिखा है...
‘‘तुमने मांगा नहीं,  कहा है.  मैंने दिया नहीं, सहा है

       एक संदेश, एक बोध, जो ब्रहम वाक्य बनकर दमक रहा है जीवन के क्षितिज पर, मार्गदर्शक का संकेत बनकर, वे समाज की विसंगतियों की ओर इशारा करते हुए  कौवे'  नामक कविता में शब्दों के बाण किस ढंग से अपनी ओर निशाने पर रखते हुए अपनी बानगी में कह उठी है...

इस देश में कौवे बहुत है / जहाँ मैं रहता हूँ
उन्हें दुत्कारने का / अधिकार नहीं है मेरा
क्योंकि मैं स्वयं भी / उनसे कम कौवा नहीं


अनायास हंसी मुस्कराहटें की हदें तोड़कर आज़ाद हुई जब समझ में आया कि यह पैगाम संगीता जी खुद को नहीं सारी मानवता को दे रही है.  शब्दों का साथ लेकर मौन भाषा भी कह उठीं हैं..

कांव कांव तू क्या करे, करेगा कितनी बार
सब चुप है तुम भी रहो, समझो सच का सार

अपने ही अस्तित्व का दृश्य, अदृश्यता में ढूँढना, अपने वजूद की तलाश में खोकर एक सच के साथ साक्षात्कार होना मनुष्य के लिए गौरवपूर्ण उपलब्धि है ...अपने होने और न होने के इस पारदर्शी पर्दे को फ़ाश करना सरलता की हदों से बहुत परे है, जिसका ज्ञान कहीं गहराइयों में धंस कर संगीता ने पाया है जो शब्दों में व्यक्त करते हुए कहती है..

हर नकार के माल में / मकडी बना, मेरा अस्तित्व
है तो - पर नहीं - सा

संगीता जी की कविताओं से गुज़रते हुए दुनियां की  मामले दारियों को सलीकेदार शब्दों में अभिव्यक्त करने की कला के दर्शन के साथ साथ परिवेश की चिंता,  दोस्ती से उतरकर दुश्मनी के मंच पर रक्स करता ज़हरीला अनुभव,  मानों हर कविता उनके व्यक्तित्व की कुंजी है.  आज़ादी समझ से पाई जाती है, हासिल की जाती है, पैदा नहीं होती - पराधीनता में पराधीन अवस्था की उपज.  जो बात सामान्य आदमी देखता है और देखकर अनदेखा कर जाता है, रचनाकर उसी उल्झन को सुलझाने  का प्रयास करता है.  लेखक पीड़ा को महसूस करके,  उसे प्रकट रूप में प्रस्तुत कर पाने की क्षमता रखता हैं,  वही कला, वही फ़न संगीता जी के काव्य में पाया जाता है. सोच की शिला को शब्दों की सहायता से तराशकर एक अनुभव की आकृति में प्रस्तुत करने की अनुपम कोशिश की है

       अपने भीतर झाँककर देखना आत्मालोकन की क्षमता को बढ़कर अपने आपको सच के सामने खड़े होने का साहस पाना अपने आपमें एक आश्चर्यजनक अनुभूति बन जाती है. मन रूपी पंछी शरीर के पिंजडे में कैद, रिहाई की आस लिये जो छटपटाहट के दायरे में अपने अंदर खुद को ढूँढता है,  फिर भी मजबूर देखता  रह जाता -

हाथ उठाये । बिन हिले -डुले - मजबूर  सच में देखा जाय तो संवेदनशील  हृदय की पारदर्शी अभिव्यक्ति शब्द कविता का सर्वश्रेष्ठ प्रतिनिधि है..

‘‘विश्वास की दृष्टि को चाहिये / सत्य का आकाश, तथ्यों का प्रकाश
अविचारी श्रद्धा अथवा अविश्वास / देते है हमको अंधत्व

हर भ्रम की सीमाओं को उलांघते हुए, प्रेम के अयाम से साक्षात्कार कराती हुई संगीता जी के खरे खरे शब्दों में दुहरा रही हूँ...

प्यार वो / लेना है तो अपनाओ पूरा का पूरा /नहीं तो छोड दो ........
.यह वह  खरा सोना है / जिसके गहने नहीं बनते

स्त्री मन की करवट लेती कई धारायें, धारणाएं, बनकर प्रश्न - चिन्ह भी उकेर देती है - बुद्धि पर पड़े अंध विश्वास के बारे में, सबके मुंह पर सन्नाटों के चिपटे टेप, चौराहे पर लावारिश लाशों का घोषित किया जाना,  मौत की घातक -धारदार मार को मन की भावना ने झेला है, विज्ञान की नई राह पर जहां सभ्यता ने मापदँड के नये नये पैमाने विकसित किये है, दूर दूर के रास्ते नज़दीकियों के दायरे में ला ख़ड़े किये हैं, और सफ़र के  छोर पर रेगिरस्तान को हरा - भरा करने का जो प्रयत्न है किया है वो शब्दों से एक सकारात्मक  चित्र को रेखांकित कर रहा है..

       कवियित्री कविता की  नखशिख की विलक्षणता की पक्षधर है वह सुन्दरता से अपनी रचना को सलीके से श्रंगारित करती,  भावों में महक भरती हुई पाठक के मानस पर काव्योन्माद से परिपूरित एक छवि को निखार कर प्रस्तुत करती है. कहीं कहीं तो कविताओं का एक एक शब्द घ्वन्यात्मक,  लयात्मक और दमकता हुआ दिखई देता है, जो अपनी आभा जनमानस में बिखेरने का स्तुत्य प्रयास कर रहा है.

       उनका यह पहला सफ़ल प्रयास कई और रचनाओं  के अंकुर अपने गर्भ में लिये हुए है जो श्रंखला बनकर जरूर विकसित  होगें और साहित्य के फ़लक पर अपना  मुकाम पायेंगें. इसी विश्वास और आशा के साथ मेरी शुभ कामनाएं उनके सफ़र में हमसफ़र रहेंगी.


देवी नागरानी







समीक्षकः देवी नागरानी
न्यू जर्सी, यू. एस. .  Jan 2009,   dnangrani@gmail.com
काव्य संग्र: सूरज मेरा दुश्मन,  लेखकः संगीता सहजवाणी,  मूल्यः 75/ पृष्टः 80, प्रकाशकः परिदृश्य प्रकाशन , धोबी तलाब, मुंबई - 2 

4 comments:

  1. बहुत सुन्दर पुस्तक! उतनी ही सुन्दर समीक्षा।

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  2. संगीता सहजवाणी की पहली प्रस्तुति ’सूरज मेरा दुश्मन’ पर हार्दिक बधाई व शुभकामनाएँ.

    आदरणीया देवी जी द्वारा इस पुस्तक की समीक्षा उतनी गंभीरता और उतने ही दायित्वबोध से सामने आयी है.

    सादर

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  3. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति मंगलवार के चर्चा मंच पर ।।

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