5 October 2012

'सुता-सदन' पति का सदन - डा. शंकर लाल 'सुधाकर'

होनी तो मिटहै नहीं, अनहोनी ना होय
होनीं मेंटत शम्भु-यम , अनहोनी नित होय|१

कृष्ण-कृष्ण रटती रहै, रसना रस कों लेय
ता सों निर्बल ना बनौ, नाम मनोबल देय २

जा घर में मैया नहीं , वह घर साँच मसान
बेटा लेटा जहँ नहीं, भूत करें अस्थान ३

माता तौ घर सौं गई, पिता करे नहिं प्यार
ऐसे दीन अनाथ कौ , ईश्वर ही आधार ४

पिता भवन ना सोहती , सुता सहज अति काल
'सुता-सदन', पति का सदन, रहै तहाँ तिहुं काल ५

कामी, रोगी, आतुरी, अथवा हो भयभीत
बुद्धि भ्रमित इनकी कही , करें न इनसौं प्रीत ६


इन दोहों को उपलब्ध करवाने के लिए आप के पोते शेखर चतुर्वेदी का सहृदय आभार

हम में से अधिकांश के अग्रजों ने दोहों या अन्य छंदों की रचनाएँ की हैं। यदि आप चाहें तो उन के उत्कृष्ट छंद, परिचय व फोटोग्राफ हम तक पहुंचाने की कृपा करें। रुचिकर छंदों को वातायन में शामिल किया जायेगा।

2 comments:

  1. उत्कृष्ट छंद पढवाने के लिये शुक्रिया.

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