5 February 2011

छन्‍द - कुण्‍डलिया - एक्सक्यूजी परसन

हरदम ही देते रहें, ये या वो एक्स्क्यूज|
सज्जन वो, तुम जान लो, करते हैं कन्‍फ्यूज||
करते हैं कन्‍फ्यूज, पूजते दिखते जाहिर|
किंतु हमारी टाँग, खींचने में वो माहिर|
इतने बदलें रंग, कि शरमा जाए मौसम|
फिर भी ख़ासमखास, चहेते सबके हरदम||

4 comments:

  1. बहुत खूबसूरत कुण्डलियाँ हैँ नवीन भाई । बहुत बहुत बधाई ।

    " कुछ फूल पत्थर के भी हुआ करते है...........गजल "

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  2. अशोक भाई, अरविंद भाई और संजय ग्रोवर भाई सराहना के लिए आभारी हूँ|

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