10 October 2010

एक बाग में तरह - तरह के फूल महकते

गैंदा, चम्पा, जूही, हरसिंगार, चमेली
कमल, गुलाब, कदम्ब, रातरानी अलबेली

तरह - तरह के फूल, सभी के रंग निराले
अलग - अलग खुश्बू सबकी और ढंग निराले

अपने - अपने मौसम में सब धूम मचाते
पंच तत्व का सार, सभी जन को समझाते

एक बाग में तरह - तरह के फूल महकते
आपस में हिल - मिल रहते, ना कभी बहकते

छोटी सी बगिया जैसी है, दुनिया सारी
भाँति - भाँति के फूल जहाँ सब हैं नर नारी

फूलों की ही तरह सभी जीना सीखें गर
सारे दुख मिट जायें और जीवन हो सुखकर
 

6 comments:

  1. बहुत सुंदर नवीन भाई, बहुत सुंदर

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  2. सुन्दर अभिव्यक्ति, बधाई।

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  3. शुक्रिया जनाब संजय साहब

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  4. फूलों की ही तरह सभी जीना सीखें गर
    सारे दुख मिट जायें और जीवन हो सुखकर

    काव्य का
    खूबसूरत होना तो अहम् बात है ही ...
    लेकिन रचना में सब जन के लिए
    एक पैगाम छोड़ जाना
    और भी अहम् हो जाता है
    और यही रचनाकार की कुशलता को साबित करता है
    इस अनुपम कृति पर बधाई स्वीकारें

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  5. दानिश भाई सराहना के लिए सहृदय आभार|

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