10 October 2010

मैं तुझ को बहलाऊँ, तू मुझ को बहला - नवीन

मैं तुझ को बहलाऊँ, तू मुझ को बहला
अगर समझता है अपना तो हक़ जतला 

भटक रहा है तू, तो मैं भी तनहा हूँ
बोल कहाँ मिलना है चल तू ही बतला

डाँट-डपट कुछ भी कर, लेकिन मेरे भाई
अपने बीच में दुनियादारी को मत ला

दावा है तुझ को भी तर कर देंगे अश्क़
एक बार तो ख़ुद से मेरा ज़िक्र चला 

आज कई दिन बाद मिले हैं फिर से हम
भाई प्लीज़ ज़रा मेरे सर को सहला

पछतावे के अश्क़ बहा कर आँखों से
मैं तुझ को नहलाऊँ तू मुझ को नहला

जी करता है फिर से खेलें खेल 'नवीन'
आँख-मिचौनी वाला वो पहला-पहला


फालुन फालुन फालुन फालुन फालुन फा
22 22 22 22 22 2


4 comments:

  1. गिले, शिकायत, शिक़वे, सभी कुबूल मगर|
    तेरे मेरे बीच, ज़माने को मत ला||

    वाह कितनी सुन्दर बात कही है ...भला गिले शिकवे ज़माने के सामने क्यों ... बहुत खूब

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  2. बहुत सुन्दर .... बहुत अच्छी गज़ल बन पड़ी है ..


    तेरी भी पलकें भीग न जाएँ तो कहना|
    एक बार तो खुद से मेरा ज़िक्र चला|४|

    बहुत खूब

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  3. गिले, शिक़ायत, शिक़वे, सर-माथे, लेकिन|
    अपने- मेरे बीच, ज़माने को मत ला|२|

    ....बहुत ख़ूबसूरत..

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