31 July 2014

जीवन व्यवहार - सदाचार - आनन्द मोहनलाल चतुर्वेदी

जीवन व्यवहार

धर्म का  अनुसरण  करे वो धार्मिक

धार्मिक  जातिओं में अगर गिनती शुरू की जाये तो , सबसे पहले ब्राह्मण समाज की गिनती होती है | जो धार्मिक क्रिया कलापो पर ही जीवन यापन करते है  | मानव मात्र अपने आप को जानें कि हम किन  संस्कारी महात्माओं के अंश है , उनके जीवन का किस तरह रहन-सहन-बर्ताव - जीवन शैली, करने न करने योग्य जो भी बातें थी ,वो सब किसी-न-किसी ग्रन्थ में  उल्लखित हैं |
                        
जैसे -- स्मृतियाँ ( ४५) - पुराण  ( 19 ) - धर्मसूत्र ( ६ ) - गृह्यसूत्र  ( ३ ) - उपनिषद्( ३) - ज्योतिष (२)  - आयुर्वेद ( ४)  - तंत्र ( ४) - नीति  ( ७) - विविध ( १५) --  [{ १) महाभारत  , २) वाल्मीक रामायण , ३) श्रीमद्भगवतगीता ,४)  धर्मसिन्धु ,५)  निर्णयसिंधु , ६) भगवन्तरभास्कर , ७) यतिधर्मसंग्रह , ८) प्रायश्चित्तेन्दुशेखर ,९) भर्तृहरिशतक , १०) कौशिक रामायण , ११) गुरुगीता , १२) वृद्धसूर्यारुणकर्मविपाक , १३) सिद्धसिद्धांतसंग्रह ,१४) सर्ववेदांतसिद्धांतसारसंग्रह , १५) किरातार्जुनीयम }]   लगभग १०५ ग्रंथों में से कुछ सूत्र निकले गए हैं , जिन्हे सहज में अपने पितृ अपनाते थे | जिसे एक नाम दिया जा सकता है - ""आचार-संहिता""

हिन्दू संस्कृति अत्यंत विलक्षण हैं | इसके सभी सिद्धांत पूर्णतः वैज्ञानिक और मानवमात्रकी लौकिक तथा पारलौकिक उन्नति करनेवाले है | मनुष्य मात्र का सुगमतासे एवं शीघ्रतासे कल्याण कैसे हो - इसका जितना गम्भीर विचार हिन्दू-संस्कृतिमें किया गया है, उतना अन्यत्र उपलब्ध नहीं होता | जन्म से लेकर मृत्युपर्यन्त मनुष्य जिन-जिन वस्तुओं एवं व्यक्यिओं के संपर्क में आता है और जो-जो क्रियाएँ करता हैं , उन सबको हमारे क्रांतिदर्शी ऋषि-मुनियोंने  बड़े वैज्ञानिक ढंग से सुनियोजित, मर्यादित एवं सुसंस्कृत किया है और सबका पर्यवसान परमश्रेयकी प्राप्ति  में किया है | इसलिए भगवानने गीता में बड़ें स्पष्ट शब्दों में कहा है ----
                  
य:     शास्त्रविधिमुत्सुज्य    वर्तते    कामकारत:  |
न  स  सिद्धिमवाप्नोति  न  सुखं  न  परां गतिम्  ||
तस्माच्छास्त्रं  प्रमाणं  ते  कार्याकार्यव्यवस्थितौ
ज्ञात्वा   शास्त्रविधानोक्त्तं     कर्म     कर्तुमिहर्हसि ||  ( गीता १६/२३-२४ )
                  
" जो मनुष्य  शास्त्रविधिको छोड़कर  अपनी इच्छासे मनमाना आचरण करता है , वह न सिद्धि (अन्तः करणकी सुद्धि) - को, न सुख (शान्ती) - को और न परमगति को ही प्राप्त होता है |. अतः तेरे लिये कर्तव्य-अकर्त्तव्यकी और व्यवस्थामें शास्त्र ही प्रमाण है- ऐसा जानकर तू इस लोकमें शास्त्रविधिसे नियत कर्तव्य -कर्म करनेयोग्य है अर्थार्त तुझे शास्त्रविधिके अनुसार कर्त्तव्य -कर्म करने चाहीये|”

तात्पर्य है क़ि हम 'क्या करें, क्या न करें ? - इसकी व्य्वस्थामें शास्त्र को ही प्रमाण मानना चाहीये | जो शास्त्र के अनुसार आचरण करते हैं, वे 'नर' होते हैं और जो मनके अनुसार (मनमाना) आचरण करते हैं, वे 'वानरहोते हैं -

मतयो  यत्र  गच्छन्ति  तत्र  गच्छन्ति वानराः .|
शस्त्राणि यत्र गच्छन्ति तत्र गच्छन्ति ते नराः .||

गीतामें भगवानने ऐसे मनमाना आचरण करनेवाले मनुष्योंको  'असुरकहा हैं|
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जन न विदुरासुरा: |  ( गीता १६/७)

वर्तमान समय में उचित शिक्षा , संग , वातावरण आदि का अभाव होने से समाज में उच्छ्रंखलता बहुत बढ़ चुकी है | शास्त्र के अनुसार क्या करना चाहीये और क्या नहीं करना चाहीये    -  इस नयी  पीढ़ी  के  लोग जानते  भी नहीं और जानना चाहते भी नहीं | जो   शास्त्रीय  व्यवहार  जानते है , वे बताना चाहे  तो उनकी बात  न मानकर उनकी हंसी उड़ाते हैं | लोगों क़ि अवहेलना के कारण हमारे अनेकधर्मग्रन्थ लुप्त होते जा रहे है | जो ग्रन्थ उपलब्ध हैं , उनको पड़ने वाले भी बहुत कम हैं| पढ़ने की रुचि भी नहीं है और पढ़ने का समय भी नहीं है | शास्त्रों को जाननेवाले , बतानेवाले , और तदनुसार आचरण करने वाले सत्पुरुष दुर्लभ-से हो गए है | ऐसी परिस्थिति  में यह आवश्यक समझा गया क़ि एक ऐसे उपक्रम का का प्रयास किया जाये जिससे कि जिज्ञासु-जनों को शास्त्रों में आयी आचार-व्यवहार - सम्बन्धी आवश्यकबातों की जानकारी प्राप्त हो सके | इसी दिशा में यह प्रयत्न किया गया है |

शास्त्र अथाह समुद्र की भांति है| जो शास्त्र उपलब्ध हुए, उनका अवलोकन करके अपनी सीमितसामर्थ्य-समझ-योग्यता और समयानुसार जानकारी प्रस्तुत की गयी है| जिन बातों की जानकारी लोगों को कम है, उन बातों को मुख्यतय: प्रकाश में लाने की चेष्टा की गयी है| यद्यपि  पाठकों को कुछ बातें वर्तमान समय में अव्यवहारिक प्रतीत हो सकती है, तथापि अमुक विषय में शास्त्र क्या कहता हैं - इसकी जानकारी तो उन्हें हो  ही जायेगी| पाठकों से प्रार्थना है कि वे इन सूत्रो  को पढ़ें और इसमे आयी बातों को अपने जीवन में उतारने की चेष्टा करे| यह मात्र मेरा संकलन हैकोशिश की गयी है कि प्रत्येक क्रिया-कलाप, किये जाने वाले कर्म से सम्बंधित सूत्र एक साथ एकत्रित हो।

प्रथम कड़ी - सदाचार

1 शिक्षा , कल्प , निरुक्ति, छंद,व्याकरण और ज्योतिष - इन छ: अंगों सहित अध्यन किये  हुए  वेद भी आचारहीन मनुष्य को पवित्र नहीं कर सकते | मृत्युकाल मे आचारहीन मनुष्य को वेद वैसे ही छोड़ देते है ,जैसे पंख उगने पर पक्षी  अपने घौंसलेको | (वशिष्ठ स्मृति ६|, देवी भागवत ११ सदाचार - प्रशंसा /२/१)

2. मनुष्य आचार से आयु, अभिलषित संतान एवम अक्षय धन को प्राप्त करता है और आचार से अनिष्ट लक्षण को नष्ट कर देता है| (मनु स्मृति ४/१५६)

3. दुराचारी पुरुष संसार में निन्दित , सर्वदा दु:ख भागी , रोगी और अल्पायु होता है | (मनु स्मृति ४/१५७ ;वशिष्ठ स्मृति ६/६)

4. आचार ही धर्म को सफल बनाता है , आचार ही धनरूपी फल देता है, आचारसे मनुष्य को संपत्ति प्राप्त होती है और आचारही अशुभ लक्षणो का नाश कर देता है | (महाभारत, उद्धयोग . ११३/15)

5. " गौओं , मनुष्यों और धन से सम्पन्न होकर भी जो कुल सदाचार से हीन हैं, वे अच्छे कुलोंकी गणना में नहीं आ सकते | परन्तु थोड़े धनवाले कुल भी यदि सदाचार से सम्पन्न है तो वे अच्छी कुलोंकीगणनामें आ जाते हैं और महान यश प्राप्त करते है. (महाभारत उद्योग. ३६/२८-२९)

6.  " सदाचर की रक्षा यत्न पूर्वक करनी चाहिए | धन तो आता और जाता रहता है | धन क्षीण हो जानेपर भी सदाचारी मनुष्य क्षीण नहीं माना जाता ; किन्तु जो सदाचार से भ्रष्ट हो गया, उसे तो नष्ट ही समझाना चाहिए" | (महाभारत उद्योग. ३६/३०)

7. " मेरा ऐसा विचार है कि सदाचार से हीन मनुष्यका केवल ऊँचा कुल मान्य नहीं हो सकता; क्योकि नीच कुलमें उत्पन्न मनुष्यों का सदाचार श्रेष्ठ माना जाता है, | (महाभारत उद्योग ३४/४१)

8.  आचार से धर्म प्रकट होता है और धर्म के स्वामी भगवान विष्णु हैं | अत: जो अपने आश्रमके आचार में संलग्न है, उसके द्वारा भगवान श्रीहरि सर्वदा पूजित होते हैं | ( नारद पुराण , पूर्व. ४/२२)

9.  सदाचारी मनुष्य इहलोक और परलोक दौनौं को ही जीत लेता है | "सत" शब्दका अर्थ साधू है और साधू वही है, जो  दोषरहित हो | उस साधु पुरुष का जो आचरण होता है, उसीको सदाचार कहते हैं | ( विष्णु पुराण ३/११/२-३)

10.  आचारहीन मनुष्य संसार में निन्दित होताहै और परलोक मैं भी सुख नहीं पाता | इसलिए सबको आचारवान होना चाहिए | (शिवपुराण वा. उ. १४/५६)

11. "आचार से ही आयु , संतान तथा प्रचुर अन्न की उपलब्धि होती है | आचार संपूर्ण पातकों को दूर कर देता है| मनुष्यों के लिए आचार को कल्याणकारक परम धर्म माना गया है | आचारवान मनुष्य इस लोक में सुख भोगकर परलोक में सुखी होता है | (देवी भागवत ११/१/१०-११)

12. " (भगवान नारायण बोले -) नारद ! आचारवान मनुष्य सदा पवित्र, सदा सुखी, और सदा धन्य है - यह सत्य है, सत्य है |  ( देवी भागवत ११/२४/९८)


विनीत --  आनंद मोहनलाल चतुर्वेदी  ( नंदा ) 9022588880

No comments:

Post a Comment