31 July 2014

आज साफ़ की अलमारी, कुछ पत्र पुराने पाये - डा. कमलेश द्विवेदी

आज साफ़ की अलमारी,
कुछ पत्र पुराने पाये
उन्हें पढ़ा तो कितने मञ्ज़र
हमें नज़र फिर आये

पहले, पत्र पढ़ा – जो तुमने
पहली बार लिखा था
तुम करते हम को कितना
ज़्यादा प्यार – लिखा था
आज प्यार के सागर में, हम
फिर डूबे-उतराये
आज साफ़ की अलमारी, कुछ पत्र पुराने पाये

फिर क्रमशः वे पत्र पढे –
जो तुम ने भेजे अक्सर
जिन में से कुछ के तो अब तक
हम न दे सके उत्तर
अन्तिम पत्र तुम्हारा पाया
जब तुम हुये पराये
आज साफ़ की अलमारी, कुछ पत्र पुराने पाये

जिसमें तुमने हमें लिखा था
अब हम तुम्हें भुला दें
और तुम्हारे पत्रों को हम
रक्खें नहीं – जला दें
पर अपने ही दिल को कैसे
कोई आग लगाये
आज साफ़ की अलमारी, कुछ पत्र पुराने पाये

:- डा. कमलेश द्विवेदी

No comments:

Post a Comment

यहाँ प्रकाशित सभी सामग्री के सभी अधिकार / दायित्व तत्सम्बन्धित लेखकाधीन हैं| अव्यावसायिक प्रयोग के लिए स-सन्दर्भ लेखक के नाम का उल्लेख अवश्य करें| व्यावसायिक प्रयोग के लिए पूर्व लिखित अनुमति आवश्यक है|

साहित्यम पर अधिकान्शत: छवियाँ साभार गूगल से ली जाती हैं। अच्छा-साहित्य अधिकतम व्यक्तियों तक पहुँचाने के प्रयास के अन्तर्गत विविध सामग्रियाँ पुस्तकों, अनतर्जाल या अन्य व्यक्तियों / माध्यमों से सङ्ग्रहित की जाती हैं। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री पर यदि किसी को किसी भी तरह की आपत्ति हो तो अपनी मंशा विधिवत सम्पादक तक पहुँचाने की कृपा करें। हमारा ध्येय या मन्तव्य किसी को नुकसान पहुँचाना नहीं है।

My Bread and Butter