10 October 2010

कितना भी हो सुनहरा अच्छा नहीं लगे है - नवीन

कितना भी हो सुनहरा अच्छा नहीं लगे है
सबको, सपाट चेहरा, अच्छा नहीं लगे है

मेहमान तो बिला शक़ भगवान ही है लेकिन
हद से ज़ियादा ठहरा अच्छा नहीं लगे है

ग़ज़लों का तब मज़ा है कुछ वाह-वाह भी हो
श्रोता अगर हो बहरा अच्छा नहीं लगे है

बच्चों पे ध्यान रखना, बेशक़ ही लाज़िमी है
पर हर घड़ी का पहरा अच्छा नहीं लगे है

दुल्हन तो लाल जोड़े में ही लगे है सुंदर
दुल्हन के सर पे सहरा अच्छा नहीं लगे है




बहरे मज़ारे मुसम्मन अखरब
मफ़ऊलु फ़ाएलातुन मफ़ऊलु फ़ाएलातुन
२२१ २१२२ २२१ २१२२ 

5 comments:

  1. ग़ज़लों का तब मज़ा है कुछ वाह-वाह भी हो।
    श्रोता अगर हो बहरा लगता है अटपटा सा ।३।

    लीजिये सर हमने भी कर दी वाह ! वाह !

    बहुत ही बेहतरीन गजल है सर!

    सादर

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  2. कल 20/12/2011को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  3. Wah!!! Bahut hi sundar...

    Bahut sikhne milta hai aapse...Dhanyavaad

    Sadar

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  4. वाह सर जी बिलकुल सही कहा !
    मज़ा तो तब है जब कुछ वाह ! हो कुछ आह ! हो
    शुभकामनाएं !

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