2 September 2016

उस में रह कर उस के बाहर झाँकना अच्छा नहीं - नवीन

उस में रह कर उस के बाहर झाँकना अच्छा नहीं। 
दिल-नशीं के दिल को कमतर आँकना अच्छा नहीं॥ 

जिस की आँखों में हमारे ही हमारे ख़ाब हों। 
उस की पलकों पर उदासी टाँकना अच्छा नहीं॥ 

उस की ख़ामोशी को भी सुनना, समझना चाहिये। 
हर घड़ी बस अपनी-अपनी हाँकना अच्छा नहीं॥ 

एक दिन दिल ने कहा जा ढाँक ले अपने गुनाह। 
हम ने सोचा आईनों को ढाँकना अच्छा नहीं॥ 

प्यार तो अमरित है उस के रस का रस लीजै 'नवीन' 
बैद की बूटी समझ कर फाँकना अच्छा नहीं॥

नवीन सी. चतुर्वेदी 

No comments:

Post a Comment

नई पुरानी पोस्ट्स ढूँढें यहाँ पर

काव्य गुरु
प्रात: स्मरणीय परमादरणीय कविरत्न स्व. श्री यमुना प्रसाद चतुर्वेदी 'प्रीतम' जी

काव्य गुरु <br>प्रात: स्मरणीय परमादरणीय कविरत्न स्व. श्री यमुना प्रसाद चतुर्वेदी 'प्रीतम' जी
जन्म ११ मई १९३१
हरि शरण गमन १४ मार्च २००५

My Bread and Butter

यहाँ प्रकाशित सभी सामग्री के सभी अधिकार / दायित्व तत्सम्बन्धित लेखकाधीन हैं| अव्यावसायिक प्रयोग के लिए स-सन्दर्भ लेखक के नाम का उल्लेख अवश्य करें| व्यावसायिक प्रयोग के लिए पूर्व लिखित अनुमति आवश्यक है|

साहित्यम पर अधिकान्शत: छवियाँ साभार गूगल से ली जाती हैं। अच्छा-साहित्य अधिकतम व्यक्तियों तक पहुँचाने के प्रयास के अन्तर्गत विविध सामग्रियाँ पुस्तकों, अनतर्जाल या अन्य व्यक्तियों / माध्यमों से सङ्ग्रहित की जाती हैं। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री पर यदि किसी को किसी भी तरह की आपत्ति हो तो अपनी मंशा विधिवत सम्पादक तक पहुँचाने की कृपा करें। हमारा ध्येय या मन्तव्य किसी को नुकसान पहुँचाना नहीं है।