12 August 2016

हो सके तो ये ज़मीं-आसमाँ.....यकजा कर दे - सालिम शुजा अंसारी

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सालिम शुजा अंसारी

हो सके तो ये ज़मीं-आसमाँ.....यकजा कर दे
या मुझे उसका बना.........या उसे मेरा कर दे

मुद्दतों बाद.......वो उभरा है.....मिरी यादों में
आज की रात..... ऐ दुनिया मुझे तन्हा कर दे

जब भी जी चाहे मैं दीदार करूँ ख़ुद अपना
ए मिरी रूह......मेरे जिस्म को हुजरा कर दे

एक मुद्दत से अँधेरों की हैं...आदी.......आँखें
ये भी मुमकिन है कि सूरज मुझे अन्धा कर दे

प्यास बख़्शी है..तो फिर सब्र को चट्टान बना
और फिर..रेत के सेहराओं को दरिया कर दे

सर उठाता हूँ तो.......सर से मिरे टकराता है
एक बालिश्त.......कोई आसमाँ ऊँचा कर दे

दब न जाये...कहीं अहसान के नीचे ये ज़मीर
हो न कुछ यूँ.....कि मुझे ज़िन्दगी मुर्दा कर दे

नोच..तहरीर से अल्फ़ाज़ के ख़ुशरंग लिबास
ऐ हक़ीक़त......मिरे अहसास को नंगा कर दे

मेरे काँधों से ....मिरा सर ही उतारे "सालिम"
कोई तो हो...जो मिरा बोझ ये हलका कर दे


सालिम शुजा अंसारी
9837659083

बहरे रमल मुसम्मन मख़बून महज़ूफ़
फ़ाइलातुन फ़इलातुन फ़इलातुन फ़ेलुन

2122 1122 1122 22

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काव्य गुरु
प्रात: स्मरणीय परमादरणीय कविरत्न स्व. श्री यमुना प्रसाद चतुर्वेदी 'प्रीतम' जी

काव्य गुरु <br>प्रात: स्मरणीय परमादरणीय कविरत्न स्व. श्री यमुना प्रसाद चतुर्वेदी 'प्रीतम' जी
जन्म ११ मई १९३१
हरि शरण गमन १४ मार्च २००५

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