28 February 2014

होली का ये लाल रंग - ब्रजेन्द्र अकिंचन

होली का ये लाल रंग लहू है किसी का याकि
द्वेष-सूर्य का ही उग्र बिखरा उजाला है

सूर्ख-पीत छाया हुआ नेह-शौर्य ही है याकि
क्रोध रश्मि-पुंज शिव नेत्र ने निकाला है

प्यार का ही बिखरा है रंग दिशा-विदिशा या
मंत्र- मोहिनी का जादू विधना ने डाला है

जाने अनजाने याकि प्रेम का प्रभूत पात्र
प्रेम रंग सराबोर विधि ने उछाला है ।

1 comment:

  1. बहू अच्छा है लयात्मकता लिये हुए

    ReplyDelete

नई पुरानी पोस्ट्स ढूँढें यहाँ पर

काव्य गुरु
प्रात: स्मरणीय परमादरणीय कविरत्न स्व. श्री यमुना प्रसाद चतुर्वेदी 'प्रीतम' जी

काव्य गुरु <br>प्रात: स्मरणीय परमादरणीय कविरत्न स्व. श्री यमुना प्रसाद चतुर्वेदी 'प्रीतम' जी
जन्म ११ मई १९३१
हरि शरण गमन १४ मार्च २००५

My Bread and Butter

यहाँ प्रकाशित सभी सामग्री के सभी अधिकार / दायित्व तत्सम्बन्धित लेखकाधीन हैं| अव्यावसायिक प्रयोग के लिए स-सन्दर्भ लेखक के नाम का उल्लेख अवश्य करें| व्यावसायिक प्रयोग के लिए पूर्व लिखित अनुमति आवश्यक है|

साहित्यम पर अधिकान्शत: छवियाँ साभार गूगल से ली जाती हैं। अच्छा-साहित्य अधिकतम व्यक्तियों तक पहुँचाने के प्रयास के अन्तर्गत विविध सामग्रियाँ पुस्तकों, अनतर्जाल या अन्य व्यक्तियों / माध्यमों से सङ्ग्रहित की जाती हैं। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री पर यदि किसी को किसी भी तरह की आपत्ति हो तो अपनी मंशा विधिवत सम्पादक तक पहुँचाने की कृपा करें। हमारा ध्येय या मन्तव्य किसी को नुकसान पहुँचाना नहीं है।