28 February 2014

होली का ये लाल रंग - ब्रजेन्द्र अकिंचन

होली का ये लाल रंग लहू है किसी का याकि
द्वेष-सूर्य का ही उग्र बिखरा उजाला है

सूर्ख-पीत छाया हुआ नेह-शौर्य ही है याकि
क्रोध रश्मि-पुंज शिव नेत्र ने निकाला है

प्यार का ही बिखरा है रंग दिशा-विदिशा या
मंत्र- मोहिनी का जादू विधना ने डाला है

जाने अनजाने याकि प्रेम का प्रभूत पात्र
प्रेम रंग सराबोर विधि ने उछाला है ।

1 comment:

  1. बहू अच्छा है लयात्मकता लिये हुए

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