12 August 2016

ब्रज गजल - आर सी. शर्मा आरसी

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आर. सी. शर्मा आरसी


उन जैसी तकदीर कहाँ।
दार कहाँ और खीर कहाँ॥

अपनौ मन पीड़ागृह सौ।
बिनके मन में पीर कहाँ॥

आँखें अपनी धरती सी।
पर बादल कूँ पीर कहाँ॥

हम तौ मन में सबर करें।
बिनके हिय में धीर कहाँ॥

हम जकड़े हैं बेड़िन में।
उनके पग जंजीर कहाँ॥

बेध सकै उनके मन कूँ।
ऐसौ कोई तीर कहाँ॥

हम परदेसी या नगरी।
जे अपनी जागीर कहाँ॥

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आँख सौं आँख मिलाऔ तौ कछू बात बनै।
फासले मन के मिटाऔ तौ कछू बात बनै॥

रात भर याद चहलकदमी करै आँगन में।
भोर कूँ दरस दिखाओ तो कछू बात बनै॥

नेह की आस भरी सूखी भई आँखिन में।
चाह के दीप जराऔ तो कछू बात बनै॥

आजकल खूब सताबै है हमें इकलौपन।
आय कैं संग निभाऔ तो कछू बात बनै॥

जान पे आन बनी है सो कहा बतलामें।
आरसी कौं न सताऔ तो कछू बात बनै॥

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ज़िंदगी तेरी कहानी लिख रह्यौ हूँ।
आज बतियाँ फिर पुरानी लिख रह्यौ हूँ॥

कह न पायौ अनकही अबलौं रही जो।
ताहि गजलन की जबानी लिख रह्यौ हूँ॥

आँख तौ सूखी परीं हैं आज मेरी।
रोज बरखा रोज पानी लिख रह्यौ हूँ॥

अब तलक हिय पै लगे हैं घाव जितने।
सब तिहारी मेहरबानी लिख रह्यौ हूँ॥

पीर की पोथी भयौ जी आरसी कौ।
पीर अक्सर मैं बिरानी लिख रह्यौ रहूँ॥

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इतनौ सुन्दर तन-मन पायौ,
या सौं दुनियादारी मत कर।
फन दीनौ फनकार बनायौ,
या फन सौं गद्दारी मत कर॥

मेरी तेरी में भरमायौ,
सब में एकइ नूर समायौ,
जो काबे में सो कासी में,
तासौं तौ मक्कारी मत कर॥

राम जगत के पालनकरता,
सेवक हम वे करता-धरता,
तेरौऊ नंबर आनौ है,
फोकट नम्बरदारी मत कर॥

बिरथा इतनौ बोझ उठावै,
तेरे सोचे का है जावै,
ढोय-ढोय बोझन मर जावै,
मन कू इतनौ भारी मत कर॥

मंदिर मस्जिद कै गुरद्वारौ,
सबमें दाता एक हमारौ,
मन के भीतर जग के तीरथ,
तिन पै तौ बमबारी मत कर॥

जितनी साँस उधारी लायौ,
उनसौं अबलौं पाप कमायौ,
दूर नूर सौं करै "आरसी ",
अब ऐसी हुसियारी मत कर॥

आर सी. शर्मा आरसी
8769890505



ब्रज गजल

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