1 February 2014

कभी ऐसा नहीं लगता कभी वैसा नहीं लगता - निदा फ़ाज़ली

कभी ऐसा नहीं लगता कभी वैसा नहीं लगता
ग़रज़ के कोई भी पूरी तरह पूरा नहीं लगता

किसी के लब पे गाली है न ग़ुस्सा है निगाहों में
ये कैसा शह्र है इसमें कोई अपना नहीं लगता

अदालत मोहतरिम है जो भी चाहे फ़ैसला दे दे
सज़ा पाये न जब कोई खता अच्छा नहीं लगता

न रोशनदान चिड़ियों के, न कमरा है किताबों का
इमारतसाज़ ये नक़्शा मिरे घर का नहीं लगता

मदारी की सदा अपनी कशिश खोने लगी शायद
पुराने शोब्दों से अब नया मजमा नहीं लगता
-निदा फ़ाज़ली

1 comment:


  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन टेलीमार्केटिंग का ब्लैक-होल - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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काव्य गुरु
प्रात: स्मरणीय परमादरणीय कविरत्न स्व. श्री यमुना प्रसाद चतुर्वेदी 'प्रीतम' जी

काव्य गुरु <br>प्रात: स्मरणीय परमादरणीय कविरत्न स्व. श्री यमुना प्रसाद चतुर्वेदी 'प्रीतम' जी
जन्म ११ मई १९३१
हरि शरण गमन १४ मार्च २००५

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