1 February 2014

दोहे - विजेंद्र शर्मा

खुली आँख तो भोर ने, माँगा यही हिसाब !
पलकों की दहलीज़ तकआये कितने ख्वाब !!

यारो इस तालीम की होती नहीं किताब !
सीखो किसी फ़क़ीर से जीने के  आदाब !!

यार ! हमारे पास है बहुत बड़ी जागीर !
दिल में उसकी याद हैअरु नैनों में नीर !!

ज्यूँ मुरझाई फस्ल में,  जान डाल दे खाद !
हरा–भरा सा कर गयी ,मुझको तेरी याद !!

कब देखे है इश्क़ ये किसकी है दहलीज़ !
शहज़ादे के प्यार में पागल हुई कनीज़ !!

उर्दू - हिन्दी को  मिले  ,  ऐसे  ठेकेदार   !
जिनके घर की आबरू अंग्रेज़ी  अखबार  !!

लिखा तुम्हारी याद में जब हमने मज़मून !
काग़ज़ की भी आँख से लगा टपकने ख़ून !!

डोर किसी के हाथ में ,उड़े किसी के संग !
जीवन के आकाश में ,  हम हो गये पतंग !!

कहाँ गई वो लोरियां कहाँ गये वो चाव !
बच्चों ने भी फाड़  दी काग़ज़ वाली नाव !!

इक सच बोला और फिरदेखा ऐसा हाल !
कुछ ने नज़रें फेर ली,कुछ की आँखें लाल !!

कहे चाँद से चाँदनीआवे मोहे  लाज !
जब जमना की ओट सेमुझे निहारे ताज !!

मुझको यही सवाल बस , नौंचे है दिन-रात !
मैं तो उस के साथ था वो था  किसके  साथ  !!

लहजे  जिनके फूल से चहरे  भी  ख़ुशरंग !
उनकी बस्ती  में मिली ,दिल की  गलियाँ तंग !!

तुम ही इसमें लफ्ज़ हो और तुम्ही मफ़हूम !
तभी हमारी नज़्म है तुम जैसी मासूम !!

दरिया तेरा दायरा बढ़ तो गया ज़रूर !
मगर किनारे हो गए पहले से भी दूर !!

स्टेशन पर ही रह गये हम लहराते हाथ !
कोई ख़ुद को छोड़कर हमें ले गया साथ !!

जो अपने महबूब को,  समझे है सैयाद !
उसे इश्क़ की क़ैद से, कर दीजे आज़ाद !!

ग़म, आँसू, तनहाइयाँचारों तरफ अज़ाब !
इन कांटो के बीच भी तेरी याद गुलाब !!

ऐसे मिलता था गले जैसे भरत मिलाप !
वही गले का ले गया गले लगाकर नाप !!

तुम पर लिखनी नज़्म थी सोचा था उन्वान !
इतने में ही हो गया काग़ज़ लहू लुहान !!

1 comment:

  1. उर्दू - हिन्दी को मिले , ऐसे ठेकेदार !
    जिनके घर की आबरू , अंग्रेज़ी अखबार !!

    ---वह ..क्या बात है....

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