2 June 2013

मुझे पहले यूँ लगता था करिश्मा चाहिये मुझको - नवीन

मुझे पहले यूँ लगता था करिश्मा चाहिये मुझको
मगर अब जा के समझा हूँ क़रीना चाहिये मुझको
करिश्मा – चमत्कार, क़रीना – तमीज़, शिष्टता

तो क्या मैं इतना पापी हूँ कि इक लाड़ो नहीं बख़्शी
बहू के रूप में ही दे – तनूजा चाहिये मुझ को
तनूजा – बेटी

हिमालय का गुलाबी जिस्म इन हाथों से छूना है
कहो सूरज से उग भी जाय, अनुष्का चाहिये मुझको
अनुष्का – रौशनी, सूरज की पहली किरण

करोड़ों की ये आबादी कहीं प्यासी न मर जाये
हरिक लाख आदमी पर इक बिपाशा चाहिये मुझको
बिपाशा – नदी

नहीं हरगिज़ अँधेरों की हिमायत कर रहा हूँ मैं
नई इक भोर की ख़ातिर शबाना चाहिये मुझको
शबाना – रात

:- नवीन सी. चतुर्वेदी

बहरे हजज मुसम्मन सालिम 
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन 

1222 1222 1222 1222

7 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल सोमवार (03-06-2013) के :चर्चा मंच 1264 पर ,अपनी प्रतिक्रिया के लिए पधारें
    सूचनार्थ |

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  2. ये नूतन - सी गज़ल प्यारी,बड़ी भोली सी चाहत है
    महक जूही की शेरों में , कयामत है - कयामत है
    नगीना है , ये मीना है , कहन का क्या करीना है
    गज़ल है या कि मधुबाला ,इनायत है - इनायत है
    जहाँ मुमताज है ज़िंदा , महल ये संगमरमर का
    जहां के वास्ते मांगी , मोहब्बत की इबादत है
    बधाई हो ! गज़ल अच्छी , ये रस की माधुरी लाई
    खिंची मुस्कान की रेखा,मिली इस दिल को राहत है .

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  3. आदरणीय बहुत ही सुन्दर ग़ज़ल ... बधाई !

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  4. भई वाह ..
    सर घुमा दिया आपने ..

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