4 March 2011

दूसरी समस्या पूर्ति - दोहा - आचार्य सलिल जी और धर्मेन्द्र कुमार [३-४]

सभी साहित्य रसिकों का सादर अभिवादन

पूर्णिमा जी और निर्मला जी के दोहों का आनंद लेने के बाद अब हम पढ़ते हैं दो और सरस्वती पुत्रों को|


आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' जी को हम लोगों ने पहली समस्या पूर्ति में भी पढ़ा है| अपने ब्लॉग दिव्य नर्मदा के माध्यम से आप अनवरत साहित्य की सेवा कर रहे हैं|

होली हो ली हो रहा, अब तो बंटाधार.
मँहगाई ने लील ली, होली की रस-धार..
*
अन्यायी पर न्याय की, जीत हुई हर बार..
होली यही बता रही, चेत सके सरकार..
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आम-खास सब एक है, करें सत्य स्वीकार.
दिल के द्वारे पर करें, हँस सबका सत्कार..
*
ससुर-जेठ देवर लगें, करें विहँस सहकार.
हँसी-ठिठोली कर रही, बहू बनी हुरियार..
*
कचरा-कूड़ा दो जला, साफ़ रहे संसार.
दिल से दिल का मेल ही, साँसों का सिंगार..
*
जाति, धर्म, भाषा, वसन, सबके भिन्न विचार.
हँसी-ठहाके एक हैं, नाचो-गाओ यार..
*
यह भागी, उसने पकड़, डाला रंग निहार.
उस पर यह भी हो गयी, बिन बोले बलिहार..
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नैन लड़े, झुक, उठ, मिले, कर न सके इंकार.
गाल गुलाबी हो गए, नयन शराबी चार..
*
बौरा-गौरा ने किये, तन-मन-प्राण निसार.
द्वैत मिटा अद्वैत वर, जीवन लिया सँवार..
*
रतिपति की गति याद कर, किंशुक है अंगार.
दिल की आग बुझा रहा, खिल-खिल बरसा प्यार..
*
मन्मथ, मन मथ थक गया, छेड़ प्रीत-झंकार.
तन ने नत होकर किया, बंद कामना-द्वार..
*
'सलिल' सकल जग का करे, स्नेह-प्रेम उद्धार.
युगों-युगों मनता रहे, होली का त्यौहार
नैन झुके .........वाह आचार्य जी आपने तो बिहारी जी की याद ताजा करा दी - कहत, नटत, रीझत, खिझत वाली|




दूसरी प्रस्तुति है भाई धर्मेन्द्र कुमार सज्जन की| आपके ब्लॉग "कल्पना लोक'' में हम लोग पहले भी विचरण कर चुके हैं| इस बार की समस्या पूर्ति के विधान का पूर्ण रूपेण पालन करते हुए, एक नया प्रयोग करते हुए उन्होंने एक लघु काव्य नाटिका भेजी है| आप भी पढियेगा|

नायक:
रँगने को बेचैन हैं, तुझको लोग हजार
किसकी किस्मत में लिखा, जाने तेरा प्यार

नायिका:
क्षण भर चढ़ कर जो मिटे, ऐसा रँग बेकार
सात जनम का साथ दे, वही रंग तन मार

नायक:
बदन रँगा ना प्रेम रँग, तो जीवन है भार
कोशिश तो कर तू सखी, खड़े खड़े मत हार

नायिका:
बदन रँगा तो क्या रँगा, मन को रँग दे यार
मौका भी दस्तूर भी, होली का त्यौहार

आचार्य जी तो खैर हैं ही अपनी विद्या के पारंगत विद्वान्| इस बार तो धर्मेन्द्र भाई ने भी अभिनव प्रयोग प्रस्तुत कर हमें चौका दिया है|


अब आप की बारी हैं इन दोहों पर प्रशंसा के पुष्पों की वर्षा करने की| आपके दोहों की प्रतीक्षा है| जानकारी वाली लिंक एक बार फिर रेडी रिफरेंस के लिए:- समस्या पूर्ति: दूसरी समस्या पूर्ति - दोहा - घोषणा|

7 comments:

  1. सही कहा है नवीन भाई, आचार्य जी तो नित नये सफल प्रयोगों के आचार्य हैं। इस बार धर्मेन्द्र जी को भी प्रयोग की हवा लगी। बढ़िया दोहे बन गए हैं इसको थोड़ा बढ़ाकर आधे घंटे की एक वसंत नाटिक लिखनी और खेलनी चाहिये।

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  2. सुन्दर दोहे ,,,,आचार्य जी और सज्जन जी को बहुत -बहुत साधुवाद

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  3. आर्चार्य जी को तो हमेशा नमन ही करती हूँ उम्र से चाहे वो छोटे हों मग्र उनके ग्यान अनुसार सात जन्म भी नही हो सकती।असली दोहे सलिल जी के हैं , माँ शारदे उनकी कलम मे निवास करती है। आगे उनसे सीखते हैं। और धर्मेन्द्र जी की गज़लें शायरी तो कमाल है ही दोहे भी बहुत कमाल के हैं।बधाई धर्मेन्द्र जी को और सलिल जी को। नवीन जी आपका ये प्रयास बहुत अच्छा ;लगा इसे जारी रखियेगा। दोहों के और प्रकार भी बतायें। धन्यवाद्

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  4. लाजवाब दोहे पढ़ने को मिल रहे हैं

    सलिल जी और धर्मेन्द्र जी के दोहे भी खूब पसंद आये

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  5. Achary ji aur Dharmendr bhai ne holi ka asli aanad udel diya hai in dohon mein ... bahut hi lajawaab ...

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  6. शेखर चतुर्वेदीWed Mar 16, 04:11:00 pm 2011

    आचार्य जी ! के दोहों के बारे में कुछ कहना सूर्य को दीपक दिखाने जैसा होगा. सभी दोहे लाजवाब हैं | धर्मेन्द्र भाई ! आपका प्रयोग कमाल का है , पर ये ट्रेलर जैसा था बहुत शोर्ट , और अधिक दोहे होते तो और आनंद आता |

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  7. पूर्णिमा जी, सुरेन्द्र जी, निर्मला जी, निर्मला जी, वीनस भाई, दिगंबर नासवा जी और शेखर जी आप सबका बहुत बहुत धन्यवाद।

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