15 November 2013

जा लँग भीर बहुत है भैया कछ तौ सरकौ पर्लँग कूँ - नवीन

जा लँग भीर बहुत है भैया कछ तौ सरकौ पर्लँग कूँ
अपनी-अपनी तसरीफन की बीन बजाऔ पर्लँग कूँ
जा लँग  - इस तरफ़,  सरकौ - सरको, खिसको, पर्लँग - उस तरफ़

जा लँग टाट-दरी के प्रेमी पर्लँग सिंहासन बारे
प्रेमी हौ तौ जा लँग आऔ नईं तौ टरकौ पर्लँग कूँ
टरकौ - टरक जाओ, विदा हो जाओ, चले जाओ के सन्दर्भ में 

हम सूँ जादा किस्न के पाछें भूत परौ हो पलायन कौ
कछू जने जा लँग भी ठहरौ सब जिन जाऔ पर्लँग कूँ
जिन जाऔ - मत जाओ

खेतन में बरसात कौ पानी भर ऊ गयो तौ का चिन्ता
तनिक बहाऔ पानी जा लँग तनिक उलीचौ पर्लँग कूँ

कित्ती पुस्त गिनौगे भैया जे तौ पुरानौ रिबाज ई ए
जा लँग आँगन साफ़ करौ और धूर उड़ाऔ पर्लँग कूँ

[ब्रजभाषा - ग्रामीण]

:- नवीन सी. चतुर्वेदी



यहाँ बहुत ही भीड़ है भैया ज़रा सा खिसको परली तरफ़
अपनी-अपनी तसारीफ़ों की बीन बजाओ परली तरफ़

इधर हैं टाट-दरी के प्रेमी उधर हैं सिंहासन बारे
प्रेमी हो तो यहाँ बिराजो, नहीं तो टरको परली तरफ़
टरकौ - टरक जाओ, विदा हो जाओ, चले जाओ के सन्दर्भ में 

हम से ज़ियादा कृष्ण के पीछे भूत पड़ा था पलायन का
कुछ बंदे इस तरफ़ भी ठहरौ सब मत जाओ परली तरफ़

खेतों में बरसात का पानी भर भी गयो तौ क्या चिन्ता
थोड़ा पानी यहाँ बहाओ थोड़ा उलीचो परली तरफ़

कितनी पुश्तें गिनोगे भाई ये है बहुत पुराना रिवाज़

अपना आँगन साफ़ करो और धूल उड़ाओ परली तरफ़

1 comment:

  1. ब्रज भाषा के माधुर्य से ओत प्रोत .... बज की माटी की भीनी-भीनी सुगन्ध .... लाजवाब !!!

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काव्य गुरु
प्रात: स्मरणीय परमादरणीय कविरत्न स्व. श्री यमुना प्रसाद चतुर्वेदी 'प्रीतम' जी

काव्य गुरु <br>प्रात: स्मरणीय परमादरणीय कविरत्न स्व. श्री यमुना प्रसाद चतुर्वेदी 'प्रीतम' जी
जन्म ११ मई १९३१
हरि शरण गमन १४ मार्च २००५

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