15 August 2013

न तो अनपढ़ ही रहा और न ही क़ाबिल हुआ मैं - नवीन

न तो अनपढ़ ही रहा और न ही क़ाबिल हुआ मैं
ख़ामखा धुन्ध तेरे स्कूल में दाख़िल हुआ मैं

मेरे मरते ही ज़माने का लहू खौल उठ्ठा
ख़ामुशी ओढ़ के आवाज़ में शामिल हुआ मैं

ओस की बूँदें मेरे चारों तरफ़ जम्अ हुईं
देखते-देखते दरिया के मुक़ाबिल हुआ मैं

अब भी तक़दीर की जद में है मेरा मुस्तक़बिल
कौन से मुँह से कहूँ कब्ल से क़ाबिल हुआ मैं

अपने अन्दर से उबरते ही मिला सन्नाटा
घर से निकला तो बियाबान में दाख़िल हुआ मैं

:- नवीन सी. चतुर्वेदी
फाएलातुन फ़एलातुन फ़एलातुन फालुन
बहरे रमल मुसम्मन मखबून मुसक्कन
2122 1122 1122 22

No comments:

Post a Comment