10 November 2013

वो जो रुत जवाँ थी हम से, वो ही रुत सजा दुबारा - नवीन

वो जो रुत जवाँ थी हम से, वो ही रुत सजा दुबारा।
उसी रात की क़सम है, वो ही गीत गा दुबारा॥



वो जो बेक़रारियाँ थीं, वो ही ढो रही थीं मुझ को॥
ये सुकूँ है मेरा दुश्मन, मेरा दिल दुखा दुबारा॥



कहाँ गुल किसी चमन के, ग़मेदिल को जानते हैं।
वो जवाब दे ही देता, मैं जो पूछता दुबारा॥



बड़ी मुश्किलों से मैंने, शम्मओं के सर ढँके थे।
मेरे सर पे आ पड़ा है, वो ही मसअला दुबारा॥



तेरे दर पे सर टिका कर, तुझे सौंपना है ख़ुद को।
मैं भटक गया हूँ रस्ता, मुझे दे पता दुबारा॥




:- नवीन सी. चतुर्वेदी

बहरे रमल मुसम्मन मशकूल सालिम मज़ाइफ़ [दोगुन]
फ़एलातु फ़ाएलातुन फ़एलातु फ़ाएलातुन 
1121 2122 1121 2212 

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