24 June 2013

हाइपरटेक्स्ट और आलोचना - जगदीश्वर चतुर्वेदी

[लेखक ने यह आलेख 4 साल पहले लिखा था]


हाइपरटेक्स्ट और आलोचना- इलैक्ट्रोनिक पुस्तक और कागज की पुस्तक में बहुत थोड़ा फर्क रह गया है। बल्कि सच्चाई यह है कि कागज की पुस्तक अपरिवर्तनीय होती है। इलैक्ट्रोनिक पुस्तक परिवर्तनीय होती है। इलैक्ट्रोनिक पेज को बदल सकते हैं, स्पर्श कर सकते हैं। ''नए माध्यम की विशेषता है नयी वस्तु, प्रिंट स्थिर रहता है, इलैक्ट्रोनिक पाठ स्वयं को बदलता है।'' प्रिंट सुनिश्चित है, हम जानते हैं। इलैक्ट्रोनिक किताब की खूबी यह है कि यदि इसे सुनिश्चित रूप में देखना चाहते हैं तो इसकी कीमत अदा करनी पड़ेगी। असल में इलैक्ट्रेनिक लेखन हमारी व्यक्तिगत जरूरतों को आत्मसात् करता है। जबकि प्रिंट जन-उत्पादन की जरूरतों को आत्मसात् करता है। स्क्रीन पाठ यदि देखने में अच्छा नहीं लगता तो आप इसे इच्छानुसार बदल सकते हैं। कुछ लोग ऐसे भी हैं जो यह मानते हैं कि स्क्रीन के परिवर्तन रूप ,परिवर्तन सॉफ्टवेयर , परिवर्तनीय मीडिया के कारण भावी पीढ़ी के पास साहित्य पहुँचने में बाधा पैदा हो रही है। पुस्तक के पास पाठक होता है। वह उसका संरक्षण करता है।अनुकरण करता है। किंतु इलैक्ट्रोनिक पाठ की मुश्किल यह नहीं है। यह सरल है। इसे अपडेट कर सकते हैं। नया साफ्टवेयर बना सकते हैं। नयी प्रति तैयार कर सकते हैं। नए मीडिया में देख सकते हैं। हाइपर टेक्स्ट की विशेषता है कि इसमें लेखक और पाठक संवाद कर सकते हैं। इसे जन-उत्पादन के कारखाने सेतैयार होकर आने की जरूरत नहीं है।
 
हाइपर टेक्स्ट और हाइपर मीडिया ने अभिरूचियों का विस्फोट किया है। नए रूपों को जन्म दिया है। इन दिनों छोटे रूप और अल्प अवधि की चीजें ही स्मृति में रहती है। हाइपर टेक्स्ट में लघु कहानी पहली विधा है जो सबसे पहले आई है। इससे यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि हाइपर टेक्स्ट छोटा मीडियम है।इसका छोटा दिमाग है। क्षणिक उत्तेजना का माध्यम है। छोटा दिमाग पोगा पंडित का होता है वह स्क्रीन से डरता है। कुछ लोग यह तर्क देते रहे हैं कि हाइपर टेक्स्ट 'इनकोहरेंट' है।उसमें संरचना' का अभाव है। परंपरागतता का अभाव है। स्वेन बिर्किट्त्ज ने ''गुटेनवर्ग एलेगी '' में लिखा है कि '' मानवतावादी ज्ञान ... अंतत: सुसंगत कहानी की परंपरा पैदा करता है। अर्थपूर्ण अंतर्वस्तु पेश करता है। उसको विस्तार देता है।नए क्षेत्र खोलता है। खतरा तब पैदा होता है जब इसमें उभार आता है ,इसकी कहानी की कोई सीमा नहीं है।'' इसके दूसरे सिरे पर 'इनकोहरेंट उत्तर आधुनिकतावाद ' है। जो लोग कम्प्यूटर नापसंद करते हैं,परंपरावादी हैं, इससे अपरिचित हैं, वे सोचते हैं कि यह उनकी सरस्वती को भ्रष्ट कर देगा। नष्ट कर देगा। इसका असर हाइपर टेक्स्ट पर भी पड़ रहा है वह अपने को हल्का बनाता रहता है। हाइपर टेक्स्ट पर विचार करते समय साहित्यिक अतीत से मुक्त होकर सोचना होगा। साहित्यिक अतीत की यादें और धारणाएं पग-पग पर बाधाएं खड़ी करती हैं। हाइपर टेक्स्ट को कृत्रिम बुध्दि न मानकर कला रूप मानें तो ज्यादा बेहतर होगा। वेब और मल्टीमीडिया की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि यह पूर्वनिर्धारित चरित्रों पर निर्भर है। जबकि हाइपर टेक्स्ट मानवीय क्षमता पर निर्भर है। व्यक्तिगत अभिरूचि, विजडम ,कौशल आदि पर निर्भर है। हाल के वर्षों में बिल विली और टीना लार्सेन ने हाइपर टेक्स्ट के खुले जगत की चर्चा की है। इसी को मिशेल जॉय ने 'कंस्ट्रक्टिव हाइपर टेक्स्ट' कहा है। यह ऐसा कार्य है जिसे देखकर अन्य रचनाकार नया विजन महसूस करते हैं। इसमें हिस्सेदारी निभाने वाला गंभीरता से भाग लेता है। इसे हम प्रदर्शन की जगह समझें। यह बातचीत का आरामदायक स्थान नहीं है। कम्प्यूटर पर लिखी प्रत्येक चीज हाइपर टेक्स्ट नहीं है। बल्कि हाइपर टेक्स्ट वह है जिसमें पाठक के लिए लिंक संरचना दी गई हो। पाठक के लिए लिखने की जगह हो। इसे 'हास्पीटल ' कहते हैं। इस तरह के हाइपर टेक्स्ट में र्र्सशत्त लिंक होंगे। जिससे पाठक को संभावित मुश्किलों से बचाया जा सके। पाठक प्रत्येक लिंक का स्वतंत्र रूप में इस्तेमाल कर सके। प्रत्येक 'पाथ' का स्वतंत्र रूप से अनुकरण कर सके। पाठक का अतीत का चयन उसकी भावी रीडिंग में प्रभाव छोड़े। वह लौटकर 'हास्पीटल ' में आए। आरंभिक हाइपर टेक्स्ट में यह देखा जाता था कि पाठक कितनी बार लौटकर आता है। इससे हाइपर टेक्स्ट की पुष्टि होती थी। इसमें बदलाव की संभावनाएं भी पैदा होती थीं। किसी भी हाइपर टेक्स्ट में सिर्फ होम पेज होना एकदम निरर्थक चीज है। यदि वेब पर हाइपर टेक्स्ट को देखें तो पाएंगे कि कुछ चीजें क्रमानुवर्ती रूप में रखी हैं। कुछ आंतरिक लिंक हैं, कुछ मित्रों के लिंक हैं, कुछ ग्राहकों और सहकर्मियों के लिंक हैं। यह सामान्य संरचना मिलेगी।
 
हाइपर टेक्स्ट का पाठक सिर्फ पाठक ही नहीं है बल्कि सर्जक है। लेखक है। वह अपने काम को जैसा चाहे अंजाम दे सकता है। यह मूलत: उत्तर आधुनिक समझ है। हाइपर टेक्स्ट की जटिलताओं का इस समझ के आधार पर उद्धाटन संभव नहीं है। यदि पाठक ने कोई रचना लिखी है अथवा वह हाइपर टेक्स्ट में पाठक की बजाय लेखक बन जाता है तो हमें उसकी रचना की गुणवत्ता देखकर फैसला करना चाहिए कि क्या वह सृजन की कोटि में आती है ? असल में हमें अच्छी और बुरी रचना की केटेगरी से बचना होगा। असल में हाइपर टेक्स्ट के संदर्भ में हमें कला के उन नियमों की खोज करनी चाहिए जिनके आधार पर हम साहित्य के स्थापित मानकों, मान्यताओं,धारणाओं आदि को चुनौती देते हैं। हाइपर टेक्स्ट के आने से आलोचना और लेखक का अंत नहीं होगा। बल्कि ये दोनों समृध्द होंगे। यदि हम चाहते हैं कि हाइपर टेक्स्ट की परीक्षा अपनी शर्तों पर करें तो हमें कम से कम वे शर्तें बतानी होंगी। हमें अच्छे हाइपर टेक्स्ट को रेखांकित करना होगा। अच्छा हाइपर टेक्स्ट वह है जो मुद्रण से बेहतर रीडिंग अनुभव दे। हाइपर टेक्स्चुएलिटी को सिर्फ शोभा की चीज नहीं समझना चाहिए। जरूरी नहीं है कि हाइपर टेक्स्ट में साहित्य हो तो वह उच्चकोटि का ही हो। बल्कि इसकी संभावना ज्यादा है कि श्रेष्ठ या उच्च कोटि का साहित्य मुद्रित रूप में हो।
 
हाइपर टेक्स्ट की दो विशेषताएं हैं। पहली विशेषता है पाठ से पाठक संपर्क कर सकता है। दूसरी विशेषता है पाठ गैर -रेखीयता या बहुरेखीय संरचना है। ये दोनों विशेषताएं हम सबका हाइपर टेक्स्ट की ओर ध्यान खींचती हैं।

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