24 March 2013

चन्द अशआर - कृष्ण बिहारी नूर

कृष्ण बिहारी नूर
8 नवम्बर 1926 - 30 मई 2014

हो किस तरह से बयाँ तेरे हुस्न का आलम
ज़ुबाँ नज़र तो नहीं है नज़र ज़ुबाँ तो नहीं

*

मैं जानता हूँ वो क्यों मुझसे  रूठ जाते हैं
वो इस तरह से भी मेरे क़रीब आते हैं

*

आईना ये तो बताता है मैं क्या हूँ लेकिन
आईना इस में है ख़ामोश कि क्या है मुझमें

*

मैं एक क़तरा हूँ मेरा अलगवजूद तो है
हुआ करे जो समन्दर मेरी तलाश में है

*

बेतअल्लुक़ी उसकी कितनी जानलेवा है
आज हाथ में उस के फूल है न पत्थर है

*

किस तरह मैं देखूँ भी बातें भी करूँ तुम से
आँख अपना मज़ा चाहे दिल अपना मज़ा चाहे

*

जहाँ मैं क़ैद से छूटूँ कहीं पे मिल जाना
अभी न मिलना, अभी ज़िन्दगी की क़ैद में हूँ

*

मुद्दत से एक रात भी अपनी नहीं हुई
हर शाम कोई आया उठा ले गया मुझे

*

शख़्स मामूली वो लगता था, मगर ऐसा न था
सारी दुनिया जेब में थी, हाथ में पैसा न था

*

ये किस मुक़ाम पे ले आई जुस्तजू तेरी
कोई चिराग़ नहीं, और रौशनी है बहुत

*

मैं जिस हुनर से हूँ पोशीदा अपनी ग़ज़लों में
उसी तरह वो छुपा सारी कायनात में है

*

किसी के रुख़ से जो परदा उठा दिया मैंने
सज़ा ये पाई कि दीवानगी की क़ैद में हूँ

*

अपनी पलकों से उस के शरारे उठा
ओस की उँगलियों से शरारे उठा

*

उस से अपना ग़म कह कर किस क़दर हूँ शर्मिन्दा
मैं तो एक क़तरा हूँ और वो समन्दर है

*

हज़ार ग़म सही दिल में मगर ख़ुशी यह है
हमारे होंठों पे माँगी हुई हँसी तो नहीं

*

हुई जो जश्नेबहाराँ के नाम से मन्सूब
ये आशियानों के जलने की रौशनी तो नहीं

*

हर एक पेड़ से साये की आरज़ू न करो
जो धूप में नहीं रहते वो छाँव क्या देंगे

*

जहाँ न सुख का हो एहसास और न दुख की कसक
उसी मुक़ाम पे अब शायरी है और मैं हूँ

*

ज़मीर काँप तो जाता है आप कुछ भी कहें
वो हो गुनाह से पहले कि हो गुनाह के बाद

*

हो के बेचैन मैं भागा किया याहू [हिरन] की तरह 
बस गया था मेरे अन्दर कोई ख़ुशबु की तरह

  
मैं तो छोटा हूँ झुका दूँगा कभी भी अपना सर
सब बड़े ये तय तो कर लें - कौन है सब से बड़ा


सन 2008 में राजपाल एंड संज द्वारा प्रकाशित और कन्हैयालाल नन्दन जी द्वारा सम्पादित पुस्तक "आज के प्रसिद्ध शायर - कृष्ण बिहारी 'नूर' से उद्धृत। दादा उस्ताद के कलाम को गुलाम अली, असलम खाँ, पीनाज़ मसानी, भूपेन्द्र और रवीन्द्र जैन जैसे उच्च-कोटि के शायरों ने अपना स्वर दिया है।


दादा उस्ताज़, प्रणाम।

9 comments:

  1. दरप दरस दरसात है दर्पन कँगना हाथ ।
    परन्तु जे न बतात है चमकन के का जात ॥

    भवार्थ : --
    अहंकार से भरा दर्पण हाथ के कागन का प्रतिबिम्ब को तो दर्शाता है ।
    किन्तु यह नहीं बताता कि यह पीतल है कि सोना ॥
    अर्थात : -- "प्रत्यक्ष को साक्ष्य की आवश्यकता नहीं होती क्योंकि साक्ष्य गुण-दोष
    को नहीं दर्शाते"

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  2. कृपया अपनी बात को थोड़ा eleborate करने की कृपा करें। इस पोस्ट के बारे में संकेत खुल कर बात नहीं समझा पा रहे। बात सकारात्मक हो या नकारात्मक मर्यादा के साथ स्पष्ट करने की कृपा करें।

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  3. भावों की गहराई देख कर अभिभूत हो जाती हूँ..

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  4. बूंद अगारे सिन्धु के पर सब खारे होए |
    स्वाति की एक बिंदु के तबहिं प्यासे होए ||

    भावार्थ : --
    सागर के पास बूंदों का भण्डार है किन्तु सभी बूंदे
    खारी हैं | जभी वह स्वाति की एक बूंद का भी प्यासा होता है||
    अर्थात : -- " मात्रा की अपेक्षा गुणवत्ता श्रेष्ठ होती है"

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  5. जाती हूँ ?? किन्तु फोटो तो किसी जाता हूँ की लग रही है.....

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  6. अर्थात : -- "प्रत्यक्ष को साक्ष्य की आवश्यकता नहीं होती क्योंकि साक्ष्य गुण-दोष
    को नहीं दर्शाते"

    अर्थात: --न्यायकर्त्ता ने हत्या होते देखा हो तो फिर उसे प्रमाणित करने हेतु किसी साक्ष्य की आवश्यकता नहीं रहती.....

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  7. हर ऱोजबद नजात है, हूँ मरता मैं अपनी मौत..,
    सुबहो मशरूफियत तो शब में नींद उठाइ मुझे.....

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  8. नीतूजी, चित्र ठीक है, मात्रा ने धोखा दे दिया।
    क्षमा कीजियेगा, मोबाइल से टिप्पणी करने पर आ के स्थान पर ई हो गया, दोनों अगल बगल ही थे।

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  9. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि-
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज सोमवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ...सादर!

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