6 April 2011

पत्रकारिता यानि, आम इन्साँ का जीवन

जर्नलिस्ट भी यार, देखिए गजब करें हैं|
टी.वी. पे दिन रात, अब क्रिकेटी खबरें हैं|
क्या करते हो यार, हद्द तुमने कर डाली|
अच्छी ख़ासी न्यूज, लगे है चम्मच वाली|१|

ये निकले, वो पहुँच गये, वो बोल रहे हैं|
नाच रहे वो, कूद रहे वो, डोल रहे हैं|
ये खाया, वो पेय पिया, वो कपड़ा पहना|
ये माता, वो बाप, भाई वो उनकी बहना|२|

राजनीति में आप, 'हेय' जिसको कहते हो|
खुद वैसे ही ढोल, बजाते क्यों रहते हो|
बीत गया अब खेल, वर्ल्ड कप जीत गये हम|
बस भी करिए यार, ताकि दम में आए दम|३|

लेकिन यार रवीश, आप जो काम कर रहे|
सही अर्थ में जर्नलिज़्म का नाम कर रहे|
पत्रकारिता यानि, ग़ूढ बातों पे चिंतन|
पत्रकारिता यानि, आम इन्साँ का जीवन|४|

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7 comments:

  1. वाह नवीन भाई, बिल्कुल सही चोट है आज की छद्म पत्रकारिता पर। बधाई

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  2. अच्छी नज़्म है भाई! बधाई! रविश जी का वीकली कॉलम सही में पढने लायक है.
    ---देवेंद्र गौतम

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  3. आभार धर्मेन्द्र भाई, प्रवीण भाई और देवेन्द्र भाई

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  4. कल 25/11/2011को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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