20 January 2011

पहली समस्या पूर्ति - चौपाई - शेष धर तिवारी जी [4]

पहली समस्या पूर्ति - चौपाई - शेष धर तिवारी जी

सम्माननीय साहित्य रसिको

पहली और फिर पहली से दूसरी रचना आते आते काफ़ी वक्त लगा| अब साहित्य रसिकों को जैसे जैसे पता चल रहा है, वो अपनी अपनी रचनाएँ भेजने लगे हैं| इस शुभ कार्य में अपना अमूल्य योगदान देने के लिए आप सभी का पुन: पुन: आभार|

पहली समस्या पूर्ति 'चौपाई' की चौथी रचना हाजिर है आपके सामने| इस बार हम पढ़ते हैं एक ऐसे व्यक्ति को जो कि व्यवसाय से जुड़े होने के बावजूद साहित्य सेवा में लगे हुए हैं| इलाहाबाद की मिट्टी से जुड़े भाई श्री शेष धर तिवारी जी और मंचों से भी साहित्य की सेवा कर रहे हैं| आप अपना एक ब्लॉग [http://sheshdt.blogspot.com] भी चलाते हैं| प्रस्तुत रचना में आप के अनुभव की झलक स्पष्ट रूप से दृष्टि गोचर होती है|

एक दिवस आँगन में मेरे |
उतरे दो कलहंस सबेरे|
कितने सुन्दर कितने भोले |
सारे आंगन में वो डोले |१|

मैंने उनको खूब रिझाया |
दाना दुनका खूब खिलाया|
पर जब छूना चाहा मैंने |
फैलाए दोनों ने डैने |२|

उड़े गगन को छूना चाहें |
पायीं जैसे अपनी राहें|
अच्छी है यह प्रीत जगत की |
जैसे भगवन और भगत की |३|

दिल को मेरे तुम भाते हो |
जब भी मेरे घर आते हो|
दिल में मेरे रहते हो तुम |
कितने अच्छे लगते हो तुम|४|


सप्ताहांत में हम पढ़ेंगे एक नौजवान शायर की चौपाइयाँ|


देर से आने वाले साहित्य रसिकों को फिर से बताना चाहूँगा कि:-

समस्या पूर्ति की पंक्ति है : - "कितने अच्छे लगते हो तुम"

छंद है चौपाई
हर चरण में १६ मात्रा

अधिक जानकरी इसी ब्लॉग पर उपलब्ध है|


सभी साहित्य रसिकों का पुन: ध्यनाकर्षण करना चाहूँगा कि मैं स्वयँ यहाँ एक विद्यार्थी हूँ, और इस ब्लॉग पर सभी स्थापित विद्वतजन का सहर्ष स्वागत है उनके अपने-अपने 'ज्ञान और अनुभवों' को हम विद्यार्थियों के बीच बाँटने हेतु| इस आयोजन को गति प्रदान करने हेतु सभी साहित्य सेवियों से सविनय निवेदन है कि अपना अपना यथोचित योगदान अवश्य प्रदान करें| अपनी रचनाएँ navincchaturvedi@gmail.com पर भेजने की कृपा करें|

पहले समस्या पूर्ति के बार में और अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें:- समस्या पूर्ति: पहली समस्या पूर्ति - चौपाई

6 comments:

  1. Bahut achchhi samasyaa poorti hai

    rakesh Tewari

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  2. क्या बात है तिवारी जी चौपाई में भी कमाल कर दिया आपने।

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  3. राकेश जी, धर्मेन्द्र जी.... धन्यवाद बंधुवर

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  4. सुन्दर तुमने बिम्ब दिखाया ।

    जिसकी कविता में है छाया॥

    लखने का है ढंग निराला ।

    जिसको है कविता में ढाला ॥

    पशु पंछी मानव भी रोता ।

    बन्धन का भय सबको होता ।।

    नहीं शेष जीवन हो जाये ।

    इसी लिए डैने फैलाये॥

    खूब डूब कर लिखते हो तुम ।

    मुझको अच्छे लगते हो तुम ॥

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  5. मयंक अवस्थीFri Jan 21, 10:53:00 am 2011

    शेष जी आपकी रचना -प्रक्रिया निर्बाध ऐसे ही चले -लेकिन कंचन जी तो पारस भी हैं और पारिजात भी हैं --इनका काव्य तो अविराम निर्झर है -इनको पुन: प्रणाम ।

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  6. मयंक अवस्थीFri Jan 21, 07:25:00 pm 2011

    इस गोष्ठी में पर जब तक शेष जी शेष हैं सब कुछ शेष है

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