30 April 2014

हवा चिरचिरावै है, ब्योम आग बरसावै - नवीन

हवा चिरचिरावै है, ब्योम आग बरसावै,
जल हू जरावै - जान - इन सों बचाय दै

केवड़ा, गुलाब और चन्दन की लाग दै कें
खिरकी झरोखन में खस लगवाय दै

आगरे कौ पेठौ लाय ल्होरे टुकड़ा कराय
बर्फ सङ्ग ताहि कोरे कुल्ला में धराय दै

एक उपकार और कर दै 'नवीन' प्यारे
अपनी बगल नेंक परें सरकाय दै

:- नवीन सी. चतुर्वेदी

4 comments:

  1. :)
    अपनी बगल नेङ्क परें सरकाय दै

    लाजवाब नवीन जी !


    पूरा कवित्त मस्त है !!

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    1. आप की प्रसन्नता ही छन्द की सफलता है आदरणीय , स्नेह बना रहे

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  2. सुन्दर...सुन्दर ...नवीन जी ... आगरे कौ पेठा बर्फ संग धरिवे ते तौ सीलौ सीलौ है जावे है ...

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  3. वाह वाह ठेठ बृज के मूड का छंद ।

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काव्य गुरु
प्रात: स्मरणीय परमादरणीय कविरत्न स्व. श्री यमुना प्रसाद चतुर्वेदी 'प्रीतम' जी

काव्य गुरु <br>प्रात: स्मरणीय परमादरणीय कविरत्न स्व. श्री यमुना प्रसाद चतुर्वेदी 'प्रीतम' जी
जन्म ११ मई १९३१
हरि शरण गमन १४ मार्च २००५

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