25 October 2012

SP/2/1/6 आज भोर का स्वप्न है, हुई गरीबी दूर - धर्मेन्द्र कुमार 'सज्जन'

सभी साहित्य रसिकों का सादर अभिवादन
एक कहानी सुनने में आती है - एक चित्रकार ने सुंदर सी तस्वीर बना कर नगर चौक में रखी और उस पर लिख दिया कि भाई जिसे भी इस तस्वीर में कमी दिखे वह व्यक्ति उस कमी पर सर्कल बना दे। अगले दिन क्या देखता है कि तस्वीर पर सर्कल ही सर्कल। बड़ा ही हताश हुआ, पर हिम्मत नहीं हारी। फिर से तस्वीर बनाई, फिर से नगर चौक पर रखी, पर अब के लिखा जिस भी व्यक्ति को इस तस्वीर में कमी दिखे, उसे सुधार दे। ग़ज़ब हो गया भाई। किसी को नाक छोटी लगी तो उस ने स्केच से नीचे की तरफ खींच दी, किसी को ओंठ छोटे लगे तो उस ने स्केच से ऊपर-नींचे-लेफ्ट-राइट खींचते हुये बड़े कर दिये। आप अनुमान लगा सकते हैं कि क्या हालत हुई होगी उस तस्वीर की! शायद उसे लिखना चाहिए था कि जिस भी व्यक्ति को ये तस्वीर कमतर लगे, ख़ुद अपनी तरफ़ से बेहतर और त्रुटि-विहीन तस्वीर पेश करे। सही है न? ख़ैर। 

कल संजय मिश्रा हबीब जी ने हर बिन्दु पर तीन-तीन दोहे लिख कर भेजे हैं। निस्संदेह अच्छा काम है फिर भी मंच ने उन से निवेदन किया है कि 2-3 दिन का ब्रेक ले कर फिर से इन दोहों का पोस्ट मारटम ख़ुद कर के देखें। धर्मेन्द्र कुमार सज्जन इस प्रक्रिया से आलरेडी गुजर चुके हैं। आइये आगे बढ़ते हैं धर्मेन्द्र कुमार सज्जन जी के दोहों के साथ।

धर्मेन्द्र कुमार 'सज्जन'

ठेस-टीस
आजीवन थे जो पिता, कल कल बहता नीर
कैसे मानूँ आज वो, हैं केवल तस्वीर

उम्मीद
नथ, बिंदी, बिछुवा नहीं, बनूँ न कंगन हाथ
बस चंदन बन अंत में, जलूँ उसी के साथ

सौन्दर्य
रहे सुवासित घर सदा, आँगन बरसे नूर
माँ का पावन रूप है, जलता हुआ कपूर

आश्चर्य
आज भोर का स्वप्न है, हुई गरीबी दूर
लोकपाल बिल हो गया, ज्यूँ का त्यूँ मंजूर

हास्य
साँझ सबेरे साब को, गर न लगाया तेल
श्रम चाहे जितना करो, हो जाओगे फेल

व्यंग्य
खोज बहुरिया हूर सी, लो दहेज भरपूर
ताकि बुढ़ापा बन सके, जीवन का नासूर

विरोधाभास
निंदक सारे हो गए, जहरीले शकरंद
चढ़ा चने के झाड़ पे, लेते हैं आनंद

सीख
बिन काँटा न गुलाब हो, कमल नहीं बिन कीच
नहिं पहाड़ खाई बिना, कौन ऊँच? को नीच?

वक्रोक्ति
कहना था निज सास से, "रुको - न जाओ" मात
"रुको न - जाओ" से हुआ, घर में उल्कापात





'वाह' कहे बिना रह नहीं पा रहा धरम प्रा जी। दिल ख़ुश कर दित्ता यार। मंच अच्छे से अच्छा कहलवाने का प्रयास करता है। और उस में कुछ उन्नीसपना रहना स्वाभाविक है। कमियों को इंगित करने से परहेज़ भी नहीं, परन्तु जितने शब्द हम कमियों को दिखाने पर ख़र्च करते हैं, ज़ियादा न कर सकें तो कम से कम उतने शब्द प्रशंसा के लिए भी इस्तेमाल तो कर ही सकते हैं।

यह मंच विद्वानों-विदुषियों के बग़ैर सूना-सूना लगेगा, परन्तु इस मंच को सिर्फ़ विद्वानों-विदुषियों का मंच भी नहीं बनाना। तथाकथित छांदसिक कोंप्लिकेशन्स के भूत से डर कर जो रचनधर्मी आँखों और मन को लुभाती मृग-मरीचिकाओं  की तरफ़ चले गये थे - अब, उन में से कुछ मन की शान्ति तलाशते हुये छंदों की सघन कुंजों की तरफ़ लौटते दिखने लगे हैं। ऐसे में हमारा फर्ज़ बनता है कि ऐसा माहौल कदापि न बनाएँ जिसे देख कर वह लौटने वाले रचनाधर्मी 'फिर कभी न लौटने' की क़सम खा कर लौट जाएँ।

कल से सोमवार तक दिल्ली प्रवास पर हूँ। 27 अक्तूबर को तुफ़ैल जी के नोयडा निवास पर शाम 4 बजे से महफ़िलेशायरी का आनंद लेने के लिये। इस महफ़िल में दिल्ली एरिया के कुछ अच्छे शायरों को सुनने का मौक़ा मिलेगा। संयोग से उस दिन मेरा जन्म-दिन भी है। संभव हो तो दिल्ली-एरिया के मित्रों से मिलने की उत्कण्ठा रहेगी। मेरा मोबाइल नंबर 9967024593।

!जय माँ शारदे!

41 comments:

  1. उत्कृष्ट...सहज लय...सहज भाव-संप्रेषण...सभी दोहे सार्थक!
    धर्मेन्द्र सज्जन जी को बधाई!!

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  2. इन्द्रधनुष के रंग सी विविध रूप-रस-रीति,
    छोटी-सी दो पंक्तियाँ लेतीं मन को जीत !

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  3. दोहे अच्छे बहुत अच्छे लगे। धर्मेंद्र जी को बधाई। आपके प्रयास को नमन। जन्म दिन की अग्रिम बधाई।

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  4. पहले दोहे को मैने ऐसे पढ़ा...

    आजीवन थे जो पिता, कल तक थे तकदीर
    कैसे मानूँ आज वो, हैं केवल तस्वीर

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  5. यह वाला सबसे अच्छा लगा...

    निंदक सारे हो गए, जहरीले शकरंद
    चढ़ा चने के झाड़ पे, लेते हैं आनंद

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  6. कल 26/10/2012 को आपकी यह खूबसूरत पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  7. सुन्दर अभिव्यक्ति के लिए हार्दिक बधाई

    ठेस-टीस, उम्मीद , सौन्दर्य, सीख शीर्षकों वाले दोहे कालजयी दोहा (साहित्य) की श्रेणी के हैं ।
    सदा स्मरण रहने वाले हैं।
    हास्य,व्यंग्य, आश्चर्य , वक्रोक्ति शीर्षक वाले दोहे टाइम-पास के लिए बढ़िया हैं।

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  8. निंदक सारे हो गए, जहरीले शकरंद
    चढ़ा चने के झाड़ पे, लेते हैं आनंद

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  9. बहुत बढ़िया दोहे......बधाई धर्मेन्द्र जी को....
    पहले दोहे के लिए देवेन्द्र जी का संशोधन भी बढ़िया रहा......

    आभार..
    अनु

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  10. वाकई दोहे अच्छे हैं या...
    निंदक सारे हो गए,...............

    @देवेन्द्र जी, आपका सुझाव अच्छा है। मगर आपने सुना होगा कि "रमता जोगी बहता पानी....।" गति की अभिव्यक्ति करने के लिए इस मुहावरे का प्रयोग खूब होता है। अतः यहाँ यह कहने का प्रयास है कि जो पिता कल तक बहते पानी की तरह गतिशील थे आज तस्वीर की तरह जड़ हो गए। इसके एक कंट्रास्ट उत्पन्न होता है जो दोहे को एक अलग रंग देता है। कल कल शब्द पानी तब उत्पन्न करता है जब प्रवाह की गति प्रवाह को धारा रेखीय नहीं रहने देती। ऐसी स्थिति में पानी में आक्सीजन तेजी से घुलती है और वो अपने आप को स्वच्छ कर लेता है। अतः कल कल की आवाज करने वाला पानी बहुधा स्वच्छ होता है। इसीलिए पिता के लिए कल कल बहता नीर शब्द का प्रयोग किया है।

    उत्साह वर्द्धन के लिए आप सबका बहुत बहुत आभार। वैसे बधाई में से पचास प्रतिशत के हकदार नवीन भाई हैं जिनकी सद्प्रेरणा और बारंबार दोहे वापस लौटाने के कारण इनमें आवश्यक सुधार हुआ है।

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  11. धर्मेन्द्र जी को.बधाई ,प्रभावी दोहे,,,,

    विजयादशमी की हादिक शुभकामनाये,,,
    RECENT POST...: विजयादशमी,,,

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  12. सभी दोहे बहुत अच्छे लगे |विजय दशमी पर हार्दिक शुभकामनाएं |
    आशा

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  13. दोहे सब उत्कृष्ट हैं, शब्द शिल्प या अर्थ,
    ‘सज्जन‘ यश अर्जित करें, सिरजन कर वागर्थ।

    धर्मेंद्र जी, आपको बधाई एवं शुभकामनाएं।

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  14. आजीवन थे जो पिता कल कल बहता नीर - को और कोई कहता तो आजीवन था जो पिता कहता -- बहुत बार व्याकरण संस्कार पर हावी हो जाती है --लेकिन धर्मेन्द्र जी को बधाई कि उन्होंने संस्कार को सम्पूर्ण सम्मान दिया -- कवि को नमन !! शकरन्द --शायद शकरकन्द के लिये है --इसका अलग अलग जगह अलग अलग उच्चारण होगा -- हास्य और आश्चर्य के दोहे बहुत दमदार लगे --वैसे सारी प्रस्तुति ही अच्छी है -- बहुत बहुत बधाई धर्मेन्द्र साहब !! --मयंक

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  15. आजीवन थे जो पिता कल कल बहता नीर - को और कोई कहता तो आजीवन था जो पिता कहता -- बहुत बार व्याकरण संस्कार पर हावी हो जाती है --लेकिन धर्मेन्द्र जी को बधाई कि उन्होंने संस्कार को सम्पूर्ण सम्मान दिया -- कवि को नमन !! शकरन्द --शायद शकरकन्द के लिये है --इसका अलग अलग जगह अलग अलग उच्चारण होगा -- हास्य और आश्चर्य के दोहे बहुत दमदार लगे --वैसे सारी प्रस्तुति ही अच्छी है -- बहुत बहुत बधाई धर्मेन्द्र साहब !! --मयंक

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  16. उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवार के चर्चा मंच पर ।।

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  17. उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवार के चर्चा मंच पर ।।

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  18. आ० नवीन जी,
    धर्मेन्द्र कुमार जी ’सज्जन ’के दोहों से साक्षात्कार हेतु आभारी हूँ । ईकविता समूह छॊड्नॆ के बाद पहलीबार उनकी रचना से रूबरू हुआ । प्रतिक्रिया स्वरूप एक दोहा-
    प्रतिक्रिया

    दोहे सज्जन ने लिखे विविध भाव रस रंग पुष्प-गुच्छ मे ज्यों सुमन छटा बिखेरें संग

    कमल

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  19. पुनः आपकी यह बेहतरीन रचना शनिवार 27/10/2012 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

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  20. आ. धर्मेन्द्रजी
    उत्कृष्ट दोहों के प्रस्तुति के लिए ढेरों बधाई....

    धर्म भाव अनुसार ही,दोहे सभी सुरूप |

    हास्य व्यंग उम्मीद के,दोहे लगे अनूप ||

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  21. -----ab kya kahen sabne taaref ke hai ...koee kuchh katu-saty bhee kahane vaalaa hona chaahiye ..
    ----( hindi-tool kam nahin kar nrahaa--asuvidha ke liye khed hai..)

    1- pita to tasveer banana sunishchit hai----koee thes va tees naheen kahi jaayagee...

    2-yah ummid nahin ...ichchha hui...

    3- maan ka noor to sada hi prashbsaniy hai ...sundar bhaav ..

    4-swapn ---aashchary kab hote hain...

    5-yah haasy naheen vyangy hai....

    6-n vyangy hai n haasy ...

    7- jaharile aur kadave men antar hotaa hai n ...

    8-ye seekh hai yaa kathy...

    9- isamen vakrokti kahan hai ...viram-chinh se dwiarthataa bhav hai....

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  22. विरोधाभास
    निंदक सारे हो गए, जहरीले शकरंद
    चढ़ा चने के झाड़ पे, लेते हैं आनंद
    हास्य
    साँझ सबेरे साब को, गर न लगाया तेल
    श्रम चाहे जितना करो, हो जाओगे फेल
    आश्चर्य
    आज भोर का स्वप्न है, हुई गरीबी दूर
    लोकपाल बिल हो गया, ज्यूँ का त्यूँ मंजूर
    उम्मीद
    नथ, बिंदी, बिछुवा नहीं, बनूँ न कंगन हाथ
    बस चंदन बन अंत में, जलूँ उसी के सा
    SP/2/1/6 आज भोर का स्वप्न है, हुई गरीबी दूर - धर्मेन्द्र कुमार 'सज्जन'
    सज्जन के ये दोहरे आप से सीधा संवाद करते हैं .हमारे वक्त का आईना है .पति को परमेश्वर मानने वाली आश्रिता का बड़ा ही मार्मिक बिम्ब है

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  23. सार्थक दोहे .... हास्य वाले में हास्य से ज्यादा व्यंग्य लगता है

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  24. @डा. श्याम गुप्त जी
    आपने दोहों को इतनी गहराई से पढ़ा इसके लिए बहुत बहुत धन्यवाद।
    आपके संदेह बिल्कुल सही हैं और इनका समाधान निम्नवत हैं।
    १. दुनिया में क्या सुनिश्चित नहीं है? ये सुनिश्चित घटनाएँ ही जब असमय और अचानक घटित हो जाती हैं तो टीस उत्पन्न करती हैं।
    २. इच्छा प्रबल हो और पूरी न हो तो एक दिन वही उम्मीद बन जाती है। क्या ये इच्छा पूरी हो सकती है? या ये प्रबल नहीं है?
    ३. सिर्फ़ सुंदर भाव? हुजूर शिल्प में कुछ कमी हो तो बताएँ आपका सुझाव सिर माथे पर।
    ४. कहावत है कि भोर में देखा गया स्वप्न सच हो जाता है। अब दोहे को दुबारा पढ़िए जहाँपनाह।
    ५. ये थोड़ा हास्य थोड़ा व्यंग्य है। संपूर्ण हास्य तो चुटकुला हो जाता है। फिर चुटकुला ही न लिख दिया जाय, दोहा क्यूँ लिखें।
    ६. आप किसी होनहार (लाखों कमाने वाले) कुँआरे बेटे के बाप से ये दोहा कहकर देखिए तुरंत पता लग जाएगा व्यंग्य है या नहीं।
    ७. हुजूर यहाँ मीठा जहर कहने का प्रयास है। आप कुछ और समझ बैठे हैं।
    ८. हुजूर खाई भी उल्टा पहाड़ है। इसमें न तो पहाड़ के लिए गर्व की बात है न खाई के लिए पिछड़ेपन की बात है। सीख ये है कि ऊँच नीच व्यर्थ की बात है।
    ९. जब आप ये दोहा किसी को सुनाएँगें तो कामा कैसे दिखाएँगें उसको। मतलब आप अपने बोलने का तरीका बदलेंगे और बोलने का तरीका बदलने से अर्थांतर उत्पन्न होगा। यानि वक्रोक्ति।

    उम्मीद है कि मैंने आपकी जिज्ञासाओं को थोड़ा बहुत शांत किया होगा। आपके विचारों का हमेशा स्वागत है। छोटा होने के नाते कुछ उत्पात कर बैठा होऊँ तो क्षमा कर दीजिएगा।

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  25. ऋता शेखर मधु जी, डॉ. निशा महाराणा जी, प्रतिभा सक्सेना जी, देवेन्द्र पांडेय जी, यशवंत माथुर जी, द्विजेन्द्र द्विज जी, जनविजय जी, अनु जी, धीरेंद्र सिंह भदौरिया जी, आशा सक्सेना जी, महेंद्र वर्मा जी, मयंक अवस्थी जी, रविकर जी, कमल जी, यशोदा अग्रवाल जी, सत्यनारायण सिंह जी, वीरेंद्र कुमार शर्मा जी, संगीता स्वरूप जी दोहों को पढ़कर प्रतिक्रिया देने के लिए आप सबका बहुत बहुत आभार।

    पुनश्च:
    @कमल जी, दादा बहुत दिनों बाद दर्शन हुए। आप को दोहे पसंद आए मैं धन्य हुआ।
    @संगीता स्वरूप जी, सहमत हूँ।
    @मयंक अवस्थी जी, साहब आप वहाँ पहुँच जाते हैं जहाँ जाकर कवि रचना करता है। आपकी इस दृष्टि को नमन।
    @जनविजय जी, मेरा ही दोहा मेरे ही सर......:))

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  26. हर एक दोहे का एक खूबसूरत अर्थ बहुत अच्छा लगा पढकर बहुत सुन्दर |

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  27. bhai,dharmendr ji.. sunishchit - bat ..achank kyon hogi...

    --- achchhe tark diye hen --parantu sateek naheen hain....maine pahale hi theek tarah se padh kar tippaneen dee hai....ab bhee vahee hai...

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  28. @डॉ श्याम गुप्त जी, उदाहरण के लिए मौत है तो सभी की निश्चित लेकिन आज कोई चलता फिरता स्वस्थ आदमी अगर कल ही दिल का दौरा पड़ने से मर जाय तो क्या ये मौत अचानक नहीं कही जाएगी।

    बात आपको पूरी तरह स्पष्ट नहीं हुई तो मेरी अज्ञानता। आगे से और अच्छे तर्क देने की कोशिश करूँगा। :)))))))

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  29. धर्मेन्द्र जी के सभी दोहे बड़े ही अर्थवान हैं ! आश्चर्य वाले दोहे ने दिल खुश कर दिया ! धर्मेन्द्र जी को बहुत-बहुत बधाई !

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  30. ठेस-टीस
    आजीवन थे जो पिता, कल कल बहता नीर
    कैसे मानूँ आज वो, हैं केवल तस्वीर
    *********************************************
    टीस ह्रदय महसूसता,सच्चा वही सपूत
    भूल गए माँ बाप को,कलियुग कई कपूत ||
    *********************************************
    कल कल बहते नीर ने,कहा बहुत कुछ मित्र
    नीर बहाता पुत्र लख, नीर बहाता चित्र ||

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  31. उम्मीद
    नथ, बिंदी, बिछुवा नहीं, बनूँ न कंगन हाथ
    बस चंदन बन अंत में, जलूँ उसी के साथ
    ********************************************
    यही समर्पण भाव है ,यही प्रेम अतिरेक
    उम्मीदें दो जिस्म की ,किन्तु प्राण है एक ||

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  32. आश्चर्य
    आज भोर का स्वप्न है, हुई गरीबी दूर
    लोकपाल बिल हो गया, ज्यूँ का त्यूँ मंजूर
    *********************************************
    अचरज सुनकर हो रहा,ली निद्रा भरपूर
    होता हो हो जाय अब,सपन भोर का चूर ||

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  33. हास्य
    साँझ सबेरे साब को, गर न लगाया तेल
    श्रम चाहे जितना करो, हो जाओगे फेल
    *****************************************
    हास्य हास्य में कह गए,बिलकुल सच्ची बात
    यस सर यस सर बोलिए,दिन हो चाहे रात ||

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  34. वक्रोक्ति
    कहना था निज सास से, "रुको - न जाओ" मात
    "रुको न - जाओ" से हुआ, घर में उल्कापात
    *****************************************************
    भारी उल्कापात से ,आते हैं भूचाल
    सास साँस मत छीन ले,रखियो ज़रा ख़याल ||

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  35. बहुत सार्थक दोहे

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  36. मीनाक्षी पंत जी, साधना वैद जी एवं ओंकार जी पोस्ट पढ़कर अपनी प्रतिक्रिया देने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद।

    अरुण कुमार निगम जी, आपके स्नेह से अभिभूत हूँ। स्नेह बनाए रखें। बहुत बहुत धन्यवाद।

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  37. इतने सुन्दर दोहों के लिए बधाई

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  38. ममता बाजपेयी जी, बहुत बहुत धन्यवाद

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