30 December 2010

प्रेम - उत्पत्ति, विकास और प्रभाव

भाव जभी उदगार बन - सहज, पूछते क्षेम|
अनुभूति की कोख से, तभी जन्मता प्रेम||
तभी जन्मता प्रेम, नेम से फलता बढ़ता|
सरोकार के साथ, गगन सा ऊँचा चढ़ता|
रहता दिल में, ख़ाता गुस्सा, पीता नफ़रत|
लेता कुछ ना, हरदम देने को ही उद्यत||

चल फिर हम तुम प्रेम से, करें प्रेम की बात|
प्रेम सगाई विश्व में, सर्वोत्तम सौगात||
सर्वोत्तम सौगात, घात ना करती है ये|
कैसा भी हो जख्म, फटाफट भरती है ये|
प्रेम बिना पुरुषार्थ - विनाशक, नारि - निरंकुश|
प्रेम बढ़ा कर लेता, नर, हाथी पर अंकुश||

9 comments:

  1. सबसे ऊँची, प्रेम सगाई....

    सुन्दर अभिवक्ति, साधुवाद.

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  2. प्रेम बढा कर कर लेता ,नर, हाथी पर अंकुश।
    बहुत सुन्दर पंक्ति। सुन्दर कविता।

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  3. चल फिर हम तुम प्रेम से, करें प्रेम की बात।
    प्रेम सगाई विश्व में, सर्वोत्तम सौगात।

    वाह चतुर्वेदी जी...
    बहुत ही सुंदर कण्डलियां लिखी हैं आपने।
    पढ़कर बहुत अच्छा लगा

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  4. सुन्दर रचना!
    आपको नव वर्ष मंगलमय हो!

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  5. अरविंद जी, संजय जी, अनुपमा जी, महेंद्र जी और शास्त्री जी आप सभी का बहुत बहुत आभार| विशेषकर शास्त्री जी का आशीर्वाद पा कर मैं अभिभूत हूँ| नव वर्ष में भी आप सभी के साहित्यिक सानिध्य का रसास्वादन करने के सु-अवसर मिलते रहें, इसी कामना के साथ आप सभी को आने वाले नववर्ष [केलेंडर ईयर] की ढेर सारी शुभ कामनाएँ|

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  6. सुन्दर रचना है.
    महेंद्र वर्मा जी ने इसे अपने कमेन्ट में कुण्डलियाँ कह दिया है जबकि ये कुण्डलियाँ नहीं है.

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  7. फ़ौज़िया रियाज़ भाई और कुँवर जी बहुत बहुत आभार|
    कुँवर जी गिरिधर कविराय जी की कुण्डलिया काका हाथरसी जी तक आते आते थोड़ी बदल गयी है| आशा है आप ने दोनो को ही पढ़ा होगा| फिर भी इस के सिवा अगर कोई और जानकारी आप हम सभी से साझा कर सकें तो बहुत खुशी होगी|

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